. Types of Decrees in CPC and Their Significanceसिविल प्रक्रिया संहिता में डिक्री के प्रकार और उनका महत्व

डिक्री के प्रकार (Types of Decree)

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 2(2) के अनुसार डिक्री निम्न प्रकार की हो सकती है:

प्रारंभिक डिक्री (Preliminary Decree)

एक प्रारंभिक डिक्री में कुछ अधिकार निश्चित रूप से अवधारित किये जाते हैं और जब तक प्रारंभिक डिक्री को अपील में चुनौती नहीं दी जाती है, तब तक अवधारित अधिकार अंतिम तथा निश्चायक हो जाते हैं एवं अंतिम डिक्री में प्रश्नगत नहीं किये जा सकते हैं। एक प्रारंभिक डिक्री वह है जो आगे की कार्यवाही में काम करने के लिये वास्तविक परिणाम को छोड़कर पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों की घोषणा करती है।

यह माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा शंकर बलवंत लोखण्डे (मृत) विधिक प्रतिनिधि द्वारा बनाम चंद्रकांत शंकर लोखण्डे और अन्य (1995) के मामले में, अभिनिर्धारित किया गया कि एक प्रारंभिक डिक्री वह है जो आगे की कार्यवाही में काम करने के लिये वास्तविक परिणाम को छोड़कर पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों की घोषणा करती है।

सिविल प्रक्रिया संहिता में प्रारंभिक डिक्री के निम्नलिखित वर्गों का उल्लेख किया गया है:

  • कब्जा और अन्तः कालीन लाभों के लिये वाद (आदेश 20, नियम 12)
  • प्रशासन-वाद (आदेश 20, नियम 13)
  • पूर्वक्रय (शुफ़ा) के लिये वाद (आदेश 20, नियम 14)
  • भागीदारी के विघटन के लिये वाद (आदेश 20, नियम 15)
  • मालिक और अभिकर्ता के बीच लेखा के लिये वाद (आदेश 20, नियम 16 और 17)
  • संपत्ति के विभाजन और पृथक् कब्जे के लिये वाद (आदेश 20, नियम 18)
  • बंधक के पुरोबंध के लिये वाद (आदेश 34, नियम 2 और 3)
  • बंधक संपत्ति के विक्रय के लिये वाद (आदेश 34, नियम 4 और 5)
  • बंधक मोचन के लिये वाद (आदेश 34, नियम 7 और 8)

यद्यपि सूची संपूर्ण नहीं है और न्यायालय को उन परिस्थितियों में भी प्रारंभिक डिक्री पारित करने का अधिकार है जो संहिता द्वारा परिकल्पित नहीं हैं।

अंतिम डिक्री (Final Decree)

जब प्रारंभिक डिक्री के अनुसार आगे की जांच की जाती है और पक्षकारों के अधिकारों को अंतिम रूप से अवधारित किया जाता है तथा इस तरह के अवधारण के अनुसार एक डिक्री पारित की जाती है। वह अंतिम डिक्री कहलाती है।

जैसा कि, माननीय उच्चतम न्यायालय ने शंकर बनाम चंद्रकांत, (1995) में धारित किया था कि, एक डिक्री को दो तरह से अंतिम कहा जा सकता है:

  • जब विहित अवधि के अंदर डिक्री के विरुद्ध कोई अपील प्रस्तुत नहीं की जाती है।
  • जब डिक्री जहाँ तक उसे पारित करने वाले न्यायालय का सच है, वाद का पूरी तरह से निस्तारण कर देता है।

प्रारंभिक डिक्री और अंतिम डिक्री के बीच अंतर

प्रारंभिक डिक्री (Preliminary Decree) अंतिम डिक्री (Final Decree)
एक डिक्री प्रारंभिक है जब वाद को पूरी तरह से निस्तारण से पहले आगे की और कार्यवाही की जानी है। एक डिक्री अंतिम होती है यदि वह किसी मामले की कार्यवाही को समाप्त करती है।
यह वाद में विवादग्रस्त कुछ या एक विषय के संबंध में पक्षकारों के अधिकारों का अवधारण करता है किंतु वाद का पूर्ण रूप से निस्तारण नहीं करता है। पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों को अंतिम डिक्री द्वारा अंतिम रूप से न्यायनिर्णयन कर दिया जाता है।
एक प्रारंभिक डिक्री जांच करती है कि क्या किया जाना है। जबकि अंतिम डिक्री, प्रारंभिक डिक्री के माध्यम से प्राप्त परिणाम बताती है।
एक प्रारंभिक डिक्री अंतिम डिक्री पर निर्भर नहीं है। अंतिम डिक्री वास्तव में प्रारंभिक डिक्री पर निर्भर और उनके अधीनस्थ है।
प्रारंभिक डिक्री एक होनी चाहिये यद्यपि कुछ वादों, जैसे विभाजन वादों या भागीदारी वादों में एक से अधिक प्रारंभिक डिक्री हो सकती हैं। एक वाद में केवल एक अंतिम डिक्री होगी। यद्यपि, जहाँ कार्यवाही के दो या अधिक कारण एक साथ जुड़ जाते हैं, वहाँ एक से अधिक अंतिम डिक्री हो सकती हैं।

DIPANKARSHIL PRIYADARSHI

Dipankarshil Priyadarshi Law Student | Legal Writer Hi! I'm Dipankarshil Priyadarshi, a BA-LLB student from Lucknow University. I am passionate about law, legal writing, and sharing useful legal knowledge. Through this blog, I share simple and informative content about law, legal concepts, case laws, and topics that can help law students understand the legal field in an easy way.

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