डिक्री,आदेश और निर्णय


■परिचय (Introduction)

डिक्री, आदेश, और निर्णय भारतीय सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत विभिन्न न्यायिक दस्तावेज़ हैं।
डिक्री: किसी दीवानी मामले में अदालत द्वारा दिया गया अंतिम निर्णय, जो मुकदमे के अधिकारों का निपटारा करता है।
आदेश: अदालत के वे निर्देश जो मामले के दौरान दिए जाते हैं, लेकिन यह डिक्री नहीं होती।
निर्णय: अदालत द्वारा दिया गया वह बयान जिसमें डिक्री या आदेश के पीछे का तर्क होता है।
       
सिविल कार्यवाही में 'वाद हेतुक' प्रारंभिक बिंदु होता है। वाद हेतुक का अर्थ, किसी व्यक्ति के पास विधिक अधिकार होता है और जब उस व्यक्ति के विधिक अधिकार का उल्लंघन, होता है तब वह अपने विधिक अधिकार के उल्लंघन के परिणामस्वरूप उपचार प्राप्त करने के लिए न्यायालय में एक वादपत्र प्रस्तुत करता है तब न्यायालय मामले पर निर्णय सुनाता है एवं डिक्री पारित करता है। न्यायालय के निर्णयों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

1. डिक्री; और

2. आदेश

■ डिक्री का अर्थ (Meaning of Decree)

डिक्री को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 2(2) के अधीन परिभाषित किया गया है:
जो यह उपबंधित करती है कि-
"डिक्री" से ऐसे न्यायनिर्णयन की प्ररूपिक अभिव्यक्ति अभिप्रेत है जो, जहाँ तक कि वह उसे अभिव्यक्त करने वाले न्यायालय से संबंधित है, बाद में के सभी या किन्हीं विवादग्रस्त विषयों के संबंध में पक्षकारों के अधिकारों का निश्चायक रूप से अवधारण करता है और वह या तो प्रारंभिक या अंतिम हो सकेगी। इसके अंतर्गत वादपत्र का नामंजूर किया जाना और धारा 144 के भीतर के किसी प्रश्न का अवधारण आता है किंतु इसके अंतर्गत-

• न तो कोई ऐसा न्यायनिर्णयन आएगा जिसकी अपील, आदेश की अपील की भाँति होती है; और

• न व्यतिक्रम के लिये खारिज करने का कोई आदेश आएगा। स्पष्टीकरण- डिक्री तब प्रारंभिक होती है जब वाद के पूर्ण रूप से

निपटा दिये जा सकने से पहले आगे और कार्यवाहियों की जानी हैं। वह तब अंतिम होती है जब कि ऐसा न्यायनिर्णयन वाद को पूर्ण रूप से निपटा देता है। वह भागतः प्रारंभिक और भागतः अंतिम हो सकेंगी।

अतः सरल शब्दों में डिक्री एक प्रपत्र, जो औपचारिक रूप से एक न्यायनिर्णयन के परिणाम को व्यक्त करता है और जो वाद में विवाद के सभी या किसी विषय के संबंध में पक्षकारों के अधिकारों को निश्चायक रूप से अवधारित करता है। डिक्री होने के लिये मामले को अंतिम रूप से निर्णीत किया जाना चाहिये जिससे कि यह वाद के पक्षकारों के बीच वाद की विषय-वस्तु के संबंध में निश्चायक हो जाए जिसके संबंध में अनुतोष मांगा गया है।

इस स्तर पर पक्षकारों के अधिकार स्पष्ट होते हैं और जब तक कि विक्री को उलटा नहीं जाता है, वापस, संशोधित या अपास्त नहीं किया जाता है, तब तक पक्षकारों को डिक्री के अधीन अपने अधिकारों से बंचित नहीं किया जा सकता है।

डिक्री के आवश्यक तत्त्व (Essential Elements of a Decree)

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा आर. राधिनवेल बेट्टियार और अन्य बनाम शिवरामन तथा अन्य (1999) में यह माना गया है कि, "डिक्री" में निम्नलिखित आवश्यक तत्त्व होने चाहिये, अर्थात्

• वाद में आवश्यक रूप से एक न्यायनिर्णयन हुआ हो।

• न्यायनिर्णयन में विवाद के किसी भी विषय के संबंध में पक्षकारों के अधिकारों का अवधारण होना चाहिये।

• इस प्रकार का अवधारण निश्चायक अवधारण होना चाहिये, जिसके परिणामस्वरूप न्यायनिर्णयन की प्ररूपिक अभिव्यक्ति हो।

एक बार विवादग्रस्त विषयों के न्यायिक रूप से अवधारित हो जाने के पश्चात्, वाद का परिणाम या तो वादी के पक्ष में या प्रतिवादी के पक्ष में होता है।

न्यायनिर्णयन (Adjudication)

मरियम वेबस्टर (Merriam-Webster) डिक्शनरी द्वारा न्यायनिर्णयन शब्द को "किसी विवाद के न्यायनिर्णयन करने का कार्य या प्रक्रिया" के रूप में परिभाषित किया गया है।

न्यायालय के निर्णय को डिक्री होने के लिये, एक न्यायनिर्णयन होना चाहिये अर्थात् विवादग्रस्त विषय का न्यायिक अवधारण होना चाहिये। यदि विवाद से संबंधित किसी बिंदु पर न्यायनिर्णयन नहीं है, तो यह डिक्री नहीं है।

किसी भी विषय के न्यायिक अवधारण का अर्थ है, कि न्यायाधीश ने दोनों पक्षकारों के तकों (बहस), अभिलेख पर उपस्थित साक्ष्यों पर विचार किया है और निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये मामले में अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग किया है। इस प्रकार, प्रशासनिक प्रकृति के मामले पर निर्णय या पक्षकारों की उपस्थिति में व्यतिक्रम के लिये वाद को खारिज करने का आदेश या अभियोजन के अभाव में अपील को खारिज करने के आदेश को डिक्री नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यह विवादित मामला है और न्यायिक रूप से नहीं निपटता है। इसके अतिरिक्त इस तरह के न्यायिक अवधारण न्यायालय द्वारा होना चाहिये। अतः एक अधिकारी जो न्यायालय नहीं है. के द्वारा पारित आदेश डिक्री नहीं है।

वाद (Suit)

डिक्री तभी पारित की जा सकती है जब किसी पक्षकार के विधिक अधिकार का उल्लंघन वाद के रूप में न्यायालय में पहुँचता है। वाद का आरंभ न्यायालय में एक वादपत्र प्रस्तुत करके किया जाता है। 'वाद' शब्द को सिविल प्रक्रिया संहिता में परिभाषित नहीं किया गया है। परंतु हंसराज गुप्ता बनाम अधिकारिक परिसमापक देहरादून मंसूरी इलेक्ट्रिक ट्रामवे कंपनी लिमिटेड (1933) के मामले में, प्रिवी काउंसिल ने इस शब्द को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है:

'वाद' शब्द का सामान्य अर्थ किसी विशेष संदर्भ से भिन्न, साधारणतः ऐसी सिविल कार्यवाहियों से है जो वादपत्र प्रस्तुत करके संस्थित की जाती है। इसका अर्थ यह है कि जब कोई वाद 'सिविल वाद' नहीं है, तो कोई डिक्री भी नहीं होगी। कुछ अधिनियमों के अधीन, आवेदनों को एक वाद के रूप में माना जाता है।

उदाहरण- भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू विवाह अधिनियम, भूमि अधिग्रहण अधिनियम, मध्यस्थता अधिनियम आदि के अधीन कार्यवाही।

निर्णय जो डिक्री नहीं हैं (Decisions which are not Decrees)

दूसरी ओर, निम्नलिखित निर्णयों को डिक्री नहीं माना जाता है:

• व्यतिक्रम के लिये अपील का खारिज करना;

• लेखा लेने के लिये कमिश्नर की नियुक्तिः

• प्रतिप्रेषण का आदेश;

• अंतरिम अनुतोष देने या इंकार करने का आदेश;

• न्यायालय में प्रस्तुत करने हेतु वादपत्र लौटाने का आदेश;

• आदेश 23 नियम । के अधीन वाद का निस्तारण;

• विलंब की माफ़ी हेतु आवेदन का नामंजूर किया जाना;

• एक आवेदन को बनाए रखने योग्य आदेश;

• बिक्री रद्द करने से इंकार करने का आदेश;

• अन्तः कालीन लाभ का आकलन निदेशित करने का आदेश।

आदेश (Order)

आदेश की परिभाषा (Definition of Order)

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 2 (14) परिभाषित करती है: "आदेश का अर्थ सिविल न्यायालय के किसी विनिश्चय की प्ररूपिक अभिव्यक्ति अभिप्रेत है जो डिक्री नहीं है।"

इस प्रकार, एक न्यायालय का न्यायनिर्णयन जो डिक्री नहीं है, एक आदेश है। एक सामान्य नियम के रूप में, विधिक न्यायालय का एक आदेश वस्तुनिष्ठ विचारों पर आधारित होता है और इस तरह न्यायिक आदेश में इस विवाद्यक पर चर्चा की जानी चाहिये तथा उन कारणों की चर्चा होनी चाहिये जो न्यायालय के पास थे जिसके कारण आदेश पारित किया गया।

जबकि एक डिक्री निश्चायक रूप से पक्षकारों के अधिकारों को अवधारित करती है या वाद में विवाद के किसी भी विषय के संबंध में, जैसा कि न्यायालय ने इसे अभिव्यक्त किया है, एक आदेश पक्षकारों के अधिकारों का एक निश्चायक अवधारण नहीं हो सकता है, जैसा कि न्यायालय के संबंध में है जो उसे प्ररूपिक रूप से अपना निर्णय अभिव्यक्त करता है।

आदेश के आवश्यक तत्त्व (Essential Elements of Order)

प्ररूपिक अभिव्यक्ति (Formal Expression)

डिक्री के समान एक आदेश भी न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय की प्ररूपिक अभिव्यक्ति है। इसका अर्थ यह है, कि यह निर्णय पर पहुँचने के कारणों की व्याख्या करता है।
प्ररूपिक अभिव्यक्ति से अभिप्रेत है, उसके समक्ष प्रस्तुत किये गए मामले पर न्यायालय के निर्णय का अभिलेखन, जहाँ तक विवाद्यक का निर्णय न्यायालय द्वारा या उसके समक्ष फिर से नहीं किया जा सकता है, परंतु केवल एक उच्च अर्थात् अपीलीय न्यायालय में किया जा सकता है।

डिक्री नहीं (Not a Decree)
एक आदेश कुछ ऐसा है जो एक डिक्री नहीं है। इससे अभिप्रेत है कि यह विवाद में सभी अधिकारों और मामलों को अंतिम रूप से अवधारित कर सकता है या नहीं भी कर सकता है। आदेश सामान्यतः विधि के प्रक्रियात्मक पहलुओं पर किये जाते हैं।

लिखित में होना आवश्यक (Must be in Writing)
आदेश लिखित रूप में होना चाहिये जिससे इसको पढ़ने वाले पक्षकार स्पष्ट रूप से समझ सके कि इसके परिणाम क्या होंगे।

निष्पादन के योग्य (Capable of Execution)
सभी डिक्री, आदेश को इस तरह से लिखा जाएगा कि वह किसी अन्य दस्तावेज के संदर्भ के बिना निष्पादन में सक्षम हो और जिससे कि निर्वचन में कोई कठिनाई उत्पन्न न हो।

डिक्री और निर्णय के बीच अंतर
(Difference Between Decree and Judgment)

• "निर्णय" का अर्थ है- न्यायाधीश द्वारा डिक्री या आदेश के आधार पर दिया गया कथन। न्यायाधीश के लिये डिक्री में कथन देना आवश्यक नहीं है, यद्यपि यह निर्णय में आवश्यक है।

• इसी तरह, यह आवश्यक नहीं है कि निर्णय में आदेश की एक प्ररूपिक अभिव्यक्ति होनी चाहिये। यद्यपि ऐसा करना वांछनीय है। 1976 के संशोधन अधिनियम द्वारा अंतः स्थापित किया गया आदेश 20 का नियम 6क, यद्यपि यह लागू करता है कि निर्णय के अंतिम पैराग्राफ में अनुतोष दिया जाना चाहिये।

• इस प्रकार, निर्णय, डिक्री या आदेश के पारित होने से पहले एक चरण पर विचार करता है और निर्णय सुनाये जाने के पश्चात्, इसके अनुसरण में डिक्री होगी।

डिक्री और आदेश के बीच का अंतर (Difference Between Decree and Order)

डिक्री और आदेश के बीच का अंतर

1 डिक्री (Decree)

2 आदेश (Order)

एक डिक्री को केवल एक वाद में पारित किया जा सकता है जो वादपत्र की प्रस्तुति से शुरू हुआ है।

एक आदेश एक वादपत्र की प्रस्तुति से एक वाद से उत्पन्न हो सकता है या एक कार्यवाही से उत्पन्न हो सकता है।

एक डिक्री विवाद में सभी या किसी भी विषय के संबंध में पक्षकारों के अधिकारों का अवधारण करती है।

दूसरी ओर, एक आदेश, ऐसे अधिकारों का अवधारण अंतिम रूप से कर भी सकता है या नहीं भी।

एक डिक्री प्रारंभिक या अंतिम या भागतः रूप से प्रारंभिक और भागतः रूप से अंतिम हो सकती है।

प्रारंभिक आदेश नहीं हो सकता है।

कुछ वादों को छोड़कर, जहाँ दो डिक्री, एक प्रारंभिक और दूसरी अंतिम पारित हो जाती है, हर वाद में केवल एक डिक्री हो सकती है।

वाद या कार्यवाही के मामले में, अनेक आदेश पारित किये जा सकते हैं।
प्रत्येक डिक्री अपील योग्य है, जब तक कि अन्यथा स्पष्ट रूप से उपबंध नहीं किया जाता है।

पहली अपील में पारित डिक्री से कुछ आधारों पर दूसरी अपील उच्च न्यायालय में हो सकती है। इस प्रकार, दो अपील हो सकती हैं।

हर आदेश अपील योग्य नहीं है। केवल वे आदेश जो संहिता में निर्दिष्ट हैं, अपील योग्य हैं।

अपील योग्य आदेशों के मामले में कोई दूसरी अपील नहीं है।


आदेश, आदेश और निर्णय के बीच अंतर (Difference Between Decree, Order and Judgment)

• निर्णय, डिक्री या आदेश के पारित होने से पहले एक चरण पर विचार करता है और निर्णय सुनाये जाने के पश्चात् डिक्री या आदेश तैयार किया जाएगा।

• निर्णय से अभिप्रेत है डिक्री या आदेश के आधार पर न्यायाधीश द्वारा दिया गया कथन। न्यायाधीश द्वारा डिक्री/आदेश में कथन देना आवश्यक नहीं है, यद्यपि यह निर्णय में आवश्यक है।

• यह आवश्यक नहीं है कि निर्णय में आदेश की "प्ररूपिक अभिव्यक्ति" हो, यद्यपि ऐसा करना वांछनीय है। आदेश 20 का नियम 6क, यद्यपि, यह लागू करता है कि निर्णय के अंतिम पैराग्राफ में अनुतोष दिया जाना चाहिये। 

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DIPANKARSHIL PRIYADARSHI

Dipankarshil Priyadarshi Law Student | Legal Writer Hi! I'm Dipankarshil Priyadarshi, a BA-LLB student from Lucknow University. I am passionate about law, legal writing, and sharing useful legal knowledge. Through this blog, I share simple and informative content about law, legal concepts, case laws, and topics that can help law students understand the legal field in an easy way.

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