भूमिका:
क्या कभी आपने सोचा है कि अगर एक दिन आपके मौलिक अधिकार—जैसे आज़ादी, बोलने की स्वतंत्रता, या संपत्ति का अधिकार—एक कानून के माध्यम से छीन लिए जाएं, तो क्या होगा?
क्या भारतीय संसद को इतनी शक्ति मिलनी चाहिए कि वह आपके अधिकारों को खत्म कर सके?
उन्नीस सौ सड़सठ में 'गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य' केस में यही बड़ा सवाल खड़ा हुआ था।
इस फैसले ने भारतीय संविधान की व्याख्या को एक नया मोड़ दिया और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की नई दिशा तय की।
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केस की पृष्ठभूमि:
'गोलकनाथ' परिवार पंजाब का एक प्रतिष्ठित ज़मींदार परिवार था, जिनके पास बड़ी मात्रा में कृषि भूमि थी।
पंजाब सरकार ने 'पंजाब सिक्योरिटी ऑफ लैंड टेन्योर एक्ट, उन्नीस सौ तिरपन' और 'पंजाब लैंड रिफॉर्म्स एक्ट, उन्नीस सौ पचपन' के तहत उनकी भूमि को सील कर दिया।
सरकार के अनुसार, यह कृषि सुधारों का हिस्सा था, लेकिन गोलकनाथ परिवार ने इसे चुनौती दी।
उनका तर्क था कि यह कदम उनके संविधान के अनुच्छेद उन्नीस (1) (एफ) और इकतीस (31) के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
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मूल कानूनी प्रश्न:
इस केस का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल था:
क्या संसद को संविधान के किसी भी हिस्से को संशोधित करने की असीमित शक्ति है, जिसमें मौलिक अधिकार भी शामिल हों?
सरकार का मानना था कि अनुच्छेद तीन सौ साठ आठ (368) के तहत संसद को संविधान में संशोधन का पूर्ण अधिकार है, चाहे वह मौलिक अधिकारों को ही क्यों न छू ले।
वहीं, याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि संसद को मौलिक अधिकारों में बदलाव का अधिकार नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये संविधान की "अस्थायी संरचना" (Permanent Structure) का हिस्सा हैं।
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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय:
इस मामले में ग्यारह न्यायाधीशों की एक संवैधानिक पीठ बैठी।
छह बनाम पाँच के बहुमत से कोर्ट ने निर्णय सुनाया कि:
संसद के पास मौलिक अधिकारों को संशोधित करने की शक्ति नहीं है।
अनुच्छेद तीन सौ साठ आठ (368) केवल प्रक्रिया संबंधी संशोधनों के लिए है, न कि मौलिक अधिकारों को समाप्त करने के लिए।
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद तेरह (13) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि संसद ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करे।
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इस फैसले का प्रभाव:
इस निर्णय के बाद संसद की शक्तियों पर एक बड़ा अंकुश लग गया।
केंद्र सरकार ने इस फैसले के प्रभाव को समाप्त करने के लिए उन्नीस सौ उनहत्तर में चौबीसवां संवैधानिक संशोधन (24th Constitutional Amendment) पारित किया।
इस संशोधन के जरिए संसद को संविधान के किसी भी हिस्से, जिसमें मौलिक अधिकार भी शामिल हों, को संशोधित करने का स्पष्ट अधिकार दे दिया गया।
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मूल संरचना सिद्धांत की नींव:
गोलकनाथ केस ने "मूल संरचना सिद्धांत" (Basic Structure Doctrine) की नींव रखी, जो बाद में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (उन्नीस सौ तिहत्तर) केस में पूर्ण रूप से स्थापित हुआ।
इस सिद्धांत के अनुसार:
संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन वह संविधान की "मूल संरचना" (Basic Structure) को नहीं बदल सकती।
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निष्कर्ष:
'गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य' केस भारतीय न्यायिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
इसने यह सुनिश्चित किया कि मौलिक अधिकार केवल कागज़ी शब्द न रहकर, भारतीय नागरिकों के जीवन की असली ताकत बनें।
हालांकि, बाद में "केशवानंद भारती" केस में सुप्रीम कोर्ट ने संसद को संविधान संशोधन का अधिकार तो दिया, लेकिन "मूल संरचना सिद्धांत" के जरिए एक संतुलन भी बना दिया।
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Constitution