भारत में संवैधानिक विकास और constitutional विचारधारा

हेलो  फ्रेंड्स Thefreshlaw में एक बार फिर से आपका स्वागत है।
टॉपिक है भारत में संवैधानिक विकास कांस्टीट्यूशनल विचारधारा।
यह आज की हमारी लेख का टॉपिक है। जैसे कि हम कांस्टीट्यूशन एंड पॉलिटिकल सिलेबस में पढ़ेंगे कि भारत का संविधान कैसे बनेगा और इससे पहले हम भारत का संविधान पढ़ चुके हैं लेकिन पहले भारत में फिर से संविधान की स्थापना हुई थी जो कि भारत में बनी थी।

शासन प्रशासन और प्रणाली का प्रभाव
शासन प्रशासन और प्रणाली का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा यानी कि हमारा संविधान बनने से पहले जब ब्रिटेन का भारत में शासन था उस समय जो कानून यहां के कानून बंद करके चले गए थे या फिर जो कानून यहां के वायस या गवर्नर-जनरल ने बनाए थे, उन सभी का हमारे संविधान पर बहुत प्रभाव है। जो भी संस्थाएं हैं जैसे कि न्यायालय या संसद जो भी पार्टियां हैं, उन्होंने अपने शासन के दौरान धीरे-धीरे डिवेलप किया कि उन्होंने हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत बनाया, जो कि भारत के संविधान का हिस्सा है।

संवैधानिक विकास का अध्ययन
हमारे सिलेबस में कांस्टीट्यूशनल वीडियोग्राफी इतिहास में भी आपको संवैधानिक विकास के बारे में पता चलता है और आपके संविधान में संवैधानिक विकास की गुणवत्ता भी शामिल होती है, हालांकि इसे पढ़ने का तरीका अलग-अलग होता है।
जब हम इतिहास में देखते हैं तो वहां पर हमारा फोकस जो ऐतिहासिक इतिहास की तरफ होता है, वह ज्यादातर रहता है, लेकिन जब भी हम पढ़ते हैं तो हम इसमें शामिल होते हैं, जो हमारे संविधान से संबंधित होते हैं।

भारत में संवैधानिक अधिनियम
यहां से यहां पर लागू किया गया भारत में उदाहरण के लिए जिसे हमने देखा है:

रेगुलेटिंग एक्ट 1773
भारत सरकार अधिनियम 1935
इन प्रकार के अधिनियमों के जो ब्रिटेन की संसद से पारित हुए थे, उनके माध्यम से भारत में ऐसा क्या विकास हुआ है कि हम संवैधानिक विकास का मतलब समझ सकें।

संवैधानिक विकास के दो सिद्धांत
उनके संविधान में कुछ ऐसे आदर्श, कुछ ऐसे मूल्य जो देश के प्रशासन के लिए संविधान की आवश्यकता है।
इस संवैधानिक विकास के तहत एक चीज यह हो रही है कि हमारे देश में जो कुछ संविधान है, वह लोकतंत्र है, स्वतंत्रता है, ये सभी संवैधानिक मूल्य मौजूद हैं।

संस्थाओं और प्रणाली का विकास
ज्यूडिशरी सिस्टम, वैज्ञानिक, विधायी और न्यायिक निकाय जो भारत में कैसे डवलप हुए।
इन दो युवाओं का वैल्यूज और इंस्टिट्यूशन का अध्ययन ही संवैधानिक विकास का अध्ययन कहलाता है।

इतिहास और संविधान के संबंध
इतिहास में यह चीज हमने छोड़ी, तो हमने डिजाइन में आपको बनाया है। अब हम विकास के नजरिए से हर एक एक्ट को पढ़ेंगे।
देखें क्या-क्या हमको पढ़ा होगा जब भी हमने कोई अधिनियम पढ़ा होगा तो इसमें ऐसा नहीं होगा कि आप सभी तथ्य रख डालिए कि इस अधिनियम में यह हुआ था।

ब्रिटेन का भारत में शासन
सबसे पहले भारत में एक कंपनी ब्रिटेन से आई थी।
शुरुआत में शुद्ध व्यापार करती थी, शासन-प्रशासन से कोई मतलब नहीं था।
संवैधानिक विकास के चरण में दो कंपनियां ब्रिटेन से व्यापार करती थीं।
सम्राट का राजशाही भी वहां मौजूद था।

1857 की क्रांति और ब्रिटिश क्राउन शासन

1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश क्राउन ने शासन संभाला।
कंपनी को खत्म कर दिया गया।
ब्रिटिश क्राउन का शासन 1858 से 1948 तक चला।

महत्वपूर्ण एक्ट और अधिनियम
रेगुलेटिंग एक्ट 1773
चार्टर एक्ट 1781, 1813, 1833
भारत काउंसिल एक्ट 1861, 1892, 1909
भारत सरकार अधिनियम 1919
भारत सरकार अधिनियम 1935
स्वतंत्रता अधिनियम 1947

निष्कर्ष
संवैधानिक विकास में प्रभाव भारत में ब्रिटिश शासन, कंपनी और बाद में क्राउन के शासन से पड़ा। इन एक्टों और अधिनियमों ने भारत में संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों की नींव रखी।




DIPANKARSHIL PRIYADARSHI

Dipankarshil Priyadarshi Law Student | Legal Writer Hi! I'm Dipankarshil Priyadarshi, a BA-LLB student from Lucknow University. I am passionate about law, legal writing, and sharing useful legal knowledge. Through this blog, I share simple and informative content about law, legal concepts, case laws, and topics that can help law students understand the legal field in an easy way.

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