ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सन् 1947 का वर्ष भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों (किसीअच्छी बात को सोने केअक्षरों मेंं लिखें जाने से हैं) में लिखा जायेगा। इसी वर्ष भारत अपनी सदियों की दासता (समाज)से मुक्त हुआ था। इतने बलिदान के फलस्वरूप अर्जित इस स्वतन्त्रता को संजोये रखने के लिए इसे अभी बहुत कुछ करना था। सर्वप्रथम देश के प्रशासन का महत्त्वपूर्ण कार्य सामने था, जिसके लिए हमारे नेताओं को एक सुदृढ़ ढाँचा निर्मित करना था। भारत को एक संविधान की रचना करनी थी। यह कार्य सरल नहीं था। अनेक बाधाएँ थीं। इन सबके बावजूद संविधान निर्मात्री सभा ने अथक परिश्रम तथा कार्यकुशलता का परिचय दिया और एक सर्वमान्य संविधान की रचना करने में सफल रही। स्वतन्त्रता के पवित्र दिन के पश्चात् दूसरा ऐतिहासिक महत्व का दिन था 26 जनवरी, 1950; जब भारत का संविधान लागू किया गया जिसने भारत को संसार के समक्ष एक नये गणतन्त्र के रूप में प्रस्तुत किया।
संविधान की परिभाषा - संविधान से तात्पर्य ऐसे दस्तावेज से है जिसकी एक विशिष्ट विधिक पवित्रता होती है जो राज्य सरकार के अंगों (कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका) के ढाँचे को और उनके प्रमुख कार्यों को निर्दिष्ट करता है और उन अंगों के संचालन के लिए मार्गदर्शक सिद्धान्तों को विहित करता है।
संवैधानिक विधि- संवैधानिक विधि की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। सामान्यतः इस शब्द का प्रयोग ऐसे नियमों के लिए किया जाता है जो सरकार के प्रमुख अंगों की संरचना, उनके पारस्परिक सम्बन्धों और प्रमुख कार्यों को विनियमित करते हैं। विधिक अर्थ में ये नियम दोनों प्रकार के होते हैं-कठोर विधि नियम और प्रथाएँ (usage), जिन्हें सामान्यतः अभिमत (convention) कहा जाता है जो अधिनियमित नहीं होती हैं किन्तु सरकार से सम्बन्धित सभी व्यक्तियों पर बाध्यकारी होती हैं। ये ऐसे अनेक नियम और प्रथाएँ हैं जिनके अनुसार हमारी सरकार की प्रणाली का संचालन किया जाता है। ये इस अर्थ में विधि का भाग नहीं थे कि उनके उल्लंघन के लिए न्यायालय में कार्यवाही की जा सकती थी। यद्यपि एक संवैधानिक विधि का अधिवक्ता सरकार के विधिक पहलुओं से ही सरोकार रखता है फिर भी उसे संवैधानिक विधि के इतिहास और राजनीतिक संस्थाओं के संचालन के लिए उपयुक्त प्रथाओं और अभिमतों का ज्ञान रखना आवश्यक होता है।
किसी भी देश का संविधान एक दिन की उपज नहीं होता है। संविधान एक ऐतिहासिक विकास का परिणाम होता है। अतएव भारतीय संविधान के आधुनिक विकसित रूप को समझने के लिए उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का भी सम्यक् ज्ञान आवश्यक है। ऐतिहासिक प्रक्रिया के सम्यक् ज्ञान के बिना हम संविधान को भलीभाँति नहीं समझ सकते हैं। इसके लिए हमें अंग्रेजों के भारत आगमन काल से पहले नहीं जाना होगा; क्योंकि भारत में सांविधानिक परम्परा का विकास अंग्रेजों के भारत में आगमन के समय से ही प्रारंध हुआ। आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं का उद्भव एवं विकास इसी काल में हुआ। भारतीय संविधान के ऐरिणासिक विकास का काल सन् 1600 ई० से प्रारम्भ होता है। इसी वर्ष इंग्लैण्ड में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की गयी थी। यहाँ हम भारत में अंग्रेजों के आगमन के समय से लेकर आज तक के भारतीय संविधान के क्रमिक विकास का संक्षिप्त विवरण देंगे। इस विकास काल को हम पाँच भागों में विभाजित कर सकते हैं
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