लोकतंत्रआत्मक गणराज्य का अर्थ
'लोकतंत्रात्मक' : शब्द का तात्पर्य ऐसी सरकार से है जिसका समूचा प्राधिकार जनता में निहित होता है और जो जनता के लिए तथा जनता द्वारा स्थापित की जाती है देश का प्रशासन सीधे जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है और यह प्रतिनिधि अपने प्रशासकीय कार्यों के लिए जनता के प्रति ही उत्तरदाई होते हैं प्रत्येक 5 वर्ष के बाद जनता नए प्रतिनिधियों को निर्वाचित करती है इसी उद्देश्य के लिए संविधान प्रत्येक वयस्क नागरिकों को मताधिकार (Franchise)प्रदान करता है लोकतंत्रात्मक सरकार के निर्माण के लिए मताधिकार अपरिहार्य है और मताधिकार का सही प्रयोग करके लोकतंत्रआत्मक सरकार को सफल बनाने के लिए नागरिकों को शिक्षित होना भी अत्यंत आवश्यक है ऐसी लोकतांत्रिक सरकार का परम कर्तव्य समानता न्यायस्वतंत्रता तथा बंधुतों की भावना का सृजन करके एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है हमारे संविधान की प्रस्तावना भी इसी पुनीत उद्देश्य की प्राप्ति का आवाहन करती है।
क्या संविधान की प्रस्तावना बदली जा सकती है? Supreme Court में दायर हुई नई याचिका और कानून मंत्री का बयान
संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्द 1. प्रस्तावना संविधान की प्रस्तावना भारतीय गणराज्य के उद्देश्यों और मूल्यों का परिचय है। यह भारतीय राष्ट्र की आत्मा की झलक प्रस्तुत करती है और यह स्पष्ट करती है कि भारत एक संप्रभु, लोकतांत्रिक, गणराज्य है जो न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व जैसे मूल आदर्शों के प्रति प्रतिबद्ध है। प्रस्तावना यह दिशा भी तय करती है कि राज्य किस प्रकार की नीतियों का अनुसरण करेगा और समाज किन आदर्शों की ओर अग्रसर होगा। लेकिन, खास बात ये है कि ये शब्द संविधान के मूल ढांचा है सुप्रीम कोर्ट ने अपने अपने फैसले में बताया है जिसका आगे उल्लेख किया गया है 2. 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्द कब जुड़े? संविधान की मूल प्रस्तावना में ये दोनों शब्द शामिल नहीं थे। इन्हें 42nd Constitutional Amendment Act, 1976 के माध्यम से आपातकाल के दौरान जोड़ा गया था। यह संशोधन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा लाया गया, जब राजनीतिक असंतोष, लोकतांत्रिक आवाजों का दमन और सत्ता की केंद्रीकरण जैसी परिस...
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