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सरकारी विधि अधिकारियों में महिलाओं की भागीदारी: जस्टिस बी. वी. नागरत्ना की राय

 

सरकारी विधि अधिकारियों में महिलाओं की भागीदारी

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि सरकारी विधि अधिकारियों (Government Law Officers) में कम से कम 30 प्रतिशत महिलाएं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जब 45 वर्ष से कम आयु के पुरुष अधिवक्ताओं को उच्च न्यायालयों में नियुक्त किया जा सकता है, तो उसी मानदंड के आधार पर सक्षम महिला अधिवक्ताओं को क्यों नहीं चुना जाता? उनका यह बयान न केवल लैंगिक समानता (Gender Equality) को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि महिला अधिवक्ताओं के लिए न्यायपालिका और विधि सेवाओं में अधिक अवसर पैदा करने की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।

महिलाओं की भागीदारी क्यों आवश्यक है?

भारत की न्यायपालिका और विधि सेवाओं में अब भी महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम है। सरकारी विधि अधिकारियों में 30% महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने से निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं:

  • लैंगिक संतुलन (Gender Balance) में सुधार: न्यायपालिका और विधि सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से संतुलन कायम होगा।
  • महिलाओं के अधिकारों की बेहतर रक्षा: महिला विधि अधिकारियों की उपस्थिति से महिलाओं से जुड़े मामलों में अधिक संवेदनशीलता और न्यायसंगत दृष्टिकोण सुनिश्चित हो सकता है।
  • रोल मॉडल का निर्माण: जब महिलाएं विधि सेवाओं में उच्च पदों पर पहुँचेंगी, तो यह अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा।
  • न्यायिक निर्णयों में विविधता: पुरुषों और महिलाओं की संयुक्त भागीदारी से न्यायिक निर्णय अधिक व्यापक और समाज के हर वर्ग के प्रति संवेदनशील होंगे।

सरकारी विधि सेवाओं में महिलाओं की मौजूदा स्थिति

भारत में सरकारी विधि सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है। सरकारी अभियोजन (Prosecution), सरकारी वकीलों (Government Pleaders), और सरकारी विधि परामर्शदाताओं (Legal Advisors) के पदों पर पुरुषों का ही वर्चस्व देखने को मिलता है। कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हो सकते हैं:

  • पूर्वाग्रह और सामाजिक धारणाएँ: विधि क्षेत्र को अब भी पुरुष प्रधान पेशा माना जाता है।
  • परिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ: महिलाओं को अक्सर पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण विधि सेवाओं में पूर्ण रूप से सक्रिय होने में कठिनाई होती है।
  • प्रचार और अवसरों की कमी: महिलाओं को सरकारी विधि सेवाओं में पदोन्नति और नियुक्ति के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते।

जस्टिस नागरत्ना के सुझावों का प्रभाव

यदि सरकार जस्टिस नागरत्ना के इस सुझाव को लागू करती है, तो यह कई सकारात्मक बदलाव ला सकता है:

  • महिला वकीलों को प्रोत्साहन मिलेगा।
  • न्यायपालिका में महिलाओं की भूमिका मजबूत होगी।
  • सरकारी नीतियाँ अधिक समावेशी (Inclusive) बनेंगी।

क्या होना चाहिए अगला कदम?

सरकार को इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए, जैसे:

  • सरकारी विधि अधिकारियों के चयन में 30% महिला आरक्षण सुनिश्चित करना।
  • महिला अधिवक्ताओं को सरकारी कानून कार्यालयों में अधिक अवसर प्रदान करना।
  • महिलाओं के लिए विशेष प्रशिक्षण और मेंटरशिप कार्यक्रम चलाना।

निष्कर्ष

जस्टिस बी. वी. नागरत्ना का यह बयान भारतीय न्यायपालिका में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है। यदि इसे प्रभावी रूप से लागू किया जाता है, तो यह महिलाओं के लिए न्यायपालिका और विधि सेवाओं में आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करेगा। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इस सुझाव को कितनी गंभीरता से लेती है और इसे लागू करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

धन्यवाद

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