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भारतीय परिषद अधिनियम 1861 Indian Councils Act 1861 in Hindi

नमस्कार दोस्तों,
संवैधानिक विकास (Constitutional Development) के क्रम में आज हम बात करेंगे भारतीय परिषद अधिनियम 1861 की। यह अधिनियम बेहद अहम है क्योंकि इसके ज़रिए पहली बार भारतीयों को शासन की प्रक्रिया में शामिल किया गया।
1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार को समझ आ गया था कि बिना भारतीयों के सहयोग के भारत पर शासन लंबे समय तक संभव नहीं है। यही कारण था कि 1858 में जब कंपनी का शासन समाप्त हुआ और भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आया, तब “सहयोग की नीति” (Policy of Association) को अपनाया गया। इस नीति की झलक हमें सबसे पहले 1861 के इस अधिनियम में दिखाई देती है।

1. केंद्रीय विधान परिषद (Central Legislative Council) में परिवर्तन

1833 के एक्ट में गवर्नर जनरल + 4 सदस्यों की कार्यकारिणी बनाई गई थी।

1853 में इसमें 12 सदस्य जोड़कर केंद्रीय विधान परिषद बनाई गई, पर उसमें कोई भारतीय नहीं था।

अब 1861 के अधिनियम में गवर्नर जनरल को अधिकार दिया गया कि वह 6 से 12 अतिरिक्त सदस्य नियुक्त करे।

शर्त यह रखी गई कि इनमें से आधे सदस्य भारतीय होंगे।

इन भारतीय सदस्यों को वास्तविक अधिकार नहीं दिए गए, बल्कि सिर्फ कानून बनाने में सहयोग तक ही सीमित रखा गया।

कार्यकाल 2 वर्ष का तय किया गया।

इसी प्रावधान के तहत तीन भारतीयों को पहली बार परिषद में शामिल किया गया:

1. पटियाला के महाराजा,
2. बनारस के राजा,
3. सर दिनकर राव।
👉 यह एक ऐतिहासिक कदम था क्योंकि पहली बार भारतीयों की औपचारिक भागीदारी शासन में दर्ज हुई।

2. गवर्नर जनरल (वायसराय) की शक्तियों में वृद्धि
गवर्नर जनरल के पास पहले से ही वीटो पावर थी (यानी परिषद के निर्णय को निरस्त करने का अधिकार)।

1861 में उसे एक नई शक्ति दी गई:

अध्यादेश जारी करने की शक्ति (Ordinance Making Power)

यह अध्यादेश 6 महीने तक वैध रहता था।

इसके लिए परिषद की अनुमति आवश्यक नहीं थी।


गवर्नर जनरल को यह भी अधिकार मिला कि वह:

नए प्रांत बनाए,

प्रांतों की सीमाएँ बदले,

प्रशासकों की नियुक्ति करे।

परिषद की कार्यवाही को संचालित करने के लिए नियम बनाने का अधिकार भी उसे दिया गया।

इसी के तहत विभागीय प्रणाली (Portfolio System) की औपचारिक शुरुआत हुई, जिसे 1859 में लॉर्ड कैनिंग ने प्रारंभ किया था।

👉 मतलब यह हुआ कि भारतीयों को शामिल तो किया गया, लेकिन वास्तविक नियंत्रण वायसराय के पास ही रहा।

3. प्रांतीय शक्तियाँ और विकेंद्रीकरण की शुरुआत

1833 के एक्ट में प्रांतों की विधि बनाने की शक्ति छीन ली गई थी, और सारी शक्ति केंद्र (गवर्नर जनरल) के पास आ गई थी।

1861 में यह केंद्रीकरण तोड़ा गया और विकेंद्रीकरण (Decentralisation) शुरू किया गया।

प्रांतों को फिर से कानून बनाने की शक्ति दी गई।

लेकिन शर्त यह थी कि प्रांतीय कानूनों को गवर्नर जनरल की स्वीकृति लेनी होगी।

इसी एक्ट के तहत प्रांतीय विधान परिषदों की स्थापना भी की गई।

1862 में बंगाल,

बाद में अन्य प्रांतों में भी।


👉 यही से भारतीय प्रशासन में प्रांतों की स्वायत्तता की प्रक्रिया शुरू होती है, जो आगे 1919 और 1935 के एक्ट तक विकसित होती गई।

1861 अधिनियम के तीन मुख्य बिंदु (Exam Focus)

1. भारतीयों की पहली बार परिषद में भागीदारी (3 भारतीय सदस्य शामिल हुए)।

2. गवर्नर जनरल को अध्यादेश जारी करने की शक्ति दी गई।

3. विकेंद्रीकरण की शुरुआत – प्रांतों को कानून बनाने की शक्ति वापस दी गई।

आलोचना (Criticism)
भारतीयों को नाममात्र की जगह मिली, लेकिन वास्तविक शक्तियाँ नहीं दी गईं।

गवर्नर जनरल की शक्तियाँ इतनी अधिक थीं कि परिषद में भारतीयों की मौजूदगी महत्वहीन हो गई।

विकेंद्रीकरण सीमित था क्योंकि प्रांतीय कानूनों को गवर्नर जनरल की स्वीकृति जरूरी थी।

निष्कर्ष
भारतीय परिषद अधिनियम 1861 भारतीय संवैधानिक विकास की यात्रा में एक मील का पत्थर है।
इसने पहली बार भारतीयों को शासन की प्रक्रिया से जोड़ा, गवर्नर जनरल को और शक्तिशाली बनाया, तथा विकेंद्रीकरण की नींव रखी।
हालाँकि यह अधिनियम भारतीयों को वास्तविक अधिकार नहीं दे पाया, लेकिन यही से धीरे-धीरे आगे की दिशा तय हुई – जो 1892 और 1909 के अधिनियमों के माध्यम से और स्पष्ट होती है।


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