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भारत सरकार अधिनियम 1919 और 1935 : भारतीय संविधान की नींव



भारतीय संवैधानिक विकास का इतिहास केवल घटनाओं का क्रम नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष की कहानी है जिसमें भारतीय जनता ने धीरे-धीरे अपने अधिकारों की मांग की और ब्रिटिश सरकार को सुधार लागू करने पर मजबूर किया। इस यात्रा में भारत सरकार अधिनियम 1919 और भारत सरकार अधिनियम 1935 दो ऐसे मील के पत्थर हैं, जिन्होंने आधुनिक भारतीय संविधान की नींव तैयार की।

1919 का भारत सरकार अधिनियम (Montagu-Chelmsford Reforms)

पृष्ठभूमि
1909 का मार्ले-मिंटो सुधार अल्पसंख्यकों को पृथक निर्वाचन मंडल देने तक ही सीमित था।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ही इससे असंतुष्ट थीं।

1916 में लखनऊ पैक्ट हुआ, जिसने हिंदू-मुस्लिम एकता की नई राह दिखाई।

होम रूल मूवमेंट (एनी बेसेंट और तिलक) ने ब्रिटिश शासन पर दबाव बढ़ाया।

प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के दौरान भारत ने ब्रिटेन का साथ दिया और इसके बदले में भारतीयों को कुछ राजनीतिक अधिकार मिलने की उम्मीद जगी।

इन्हीं परिस्थितियों में भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू और वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने 1917 में घोषणा की कि भारत में “उत्तरदायी शासन” की ओर धीरे-धीरे कदम बढ़ाए जाएंगे।

प्रमुख प्रावधान
1. केंद्र में द्विसदनीय विधायिका

इससे पहले केवल एक ही केंद्रीय विधान परिषद थी।

1919 के अधिनियम से पहली बार दो सदन बनाए गए :

राज्य परिषद (Council of States) – उच्च सदन

केंद्रीय विधानसभा (Central Legislative Assembly) – निम्न सदन

आज की संसद की राज्यसभा और लोकसभा की नींव यहीं से पड़ी।

दोनों सदनों की शक्तियाँ लगभग समान थीं, लेकिन बजट केवल विधानसभा में ही पेश हो सकता था।


2. प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy)

सबसे बड़ा प्रयोग था – प्रांतों में द्वैध शासन लागू करना।

प्रांतीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया :

आरक्षित विषय – वित्त, न्याय, पुलिस, राजस्व आदि (गवर्नर और उसकी कार्यकारिणी परिषद के अधीन)

हस्तांतरित विषय – शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय प्रशासन आदि (भारतीय मंत्रियों को दिए गए)


आरक्षित विषयों पर गवर्नर जिम्मेदार था और वह विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं था।

हस्तांतरित विषयों पर भारतीय मंत्री उत्तरदायी थे।

यह प्रयोग असफल साबित हुआ और बाद में 1935 में समाप्त कर दिया गया।

3. पृथक निर्वाचक मंडल का विस्तार

1909 में केवल मुसलमानों को पृथक निर्वाचन मिला था।

1919 में इसे सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों और यूरोपीय लोगों तक बढ़ा दिया गया।

इससे सांप्रदायिकता और बढ़ी, जिसकी आलोचना कांग्रेस ने की।


4. महिलाओं को मताधिकार

पहली बार महिलाओं को सीमित मताधिकार दिया गया।

हालांकि संपत्ति, शिक्षा और कर आधारित शर्तें बनी रहीं।


5. लोक सेवा आयोग का प्रावधान

केंद्रीय लोक सेवा आयोग (Central Public Service Commission) बनाने का प्रावधान किया गया।

आयोग वास्तव में 1926 में ली आयोग की सिफारिश पर स्थापित हुआ।

आलोचना और महत्व

उत्तरदायी शासन का वादा अधूरा रहा।

प्रांतों में द्वैध शासन जटिल और असफल सिद्ध हुआ।

सांप्रदायिक निर्वाचक मंडल ने समाज को और बाँटा।

फिर भी, भारतीय मंत्रियों की भागीदारी ने भविष्य के लिए प्रशिक्षण का काम किया।

पहली बार द्विसदनात्मक व्यवस्था और महिलाओं के मताधिकार की शुरुआत हुई।

1935 का भारत सरकार अधिनियम

पृष्ठभूमि

1919 के अधिनियम के लागू होने के बाद स्पष्ट हो गया कि इससे भारतीयों की आकांक्षाएँ पूरी नहीं होंगी। द्वैध शासन असफल रहा और कांग्रेस तथा अन्य दलों ने और अधिक अधिकारों की मांग शुरू कर दी।

1927 में साइमन कमीशन भारत भेजा गया, जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। इसके विरोध में पूरा देश “साइमन गो बैक” के नारे से गूंज उठा।
1930 से 1932 तक गोलमेज सम्मेलन हुए।
अंततः, 1935 में नया अधिनियम लाया गया।
प्रमुख प्रावधान
1. प्रांतीय स्वायत्तता

द्वैध शासन समाप्त कर दिया गया।

प्रांतों को पूर्ण स्वायत्तता दी गई।

मंत्रिपरिषद विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनी।

2. संघीय व्यवस्था

पूरे भारत के लिए एक संघीय ढांचा प्रस्तावित किया गया, जिसमें प्रांत और रियासतें शामिल होतीं।

हालांकि अधिकांश रियासतों ने इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया, इसलिए यह भाग लागू नहीं हुआ।

3. द्विसदनीयता का विस्तार

बंबई, मद्रास, बंगाल और बिहार में द्विसदनीय विधायिका की व्यवस्था की गई।

4. मताधिकार का विस्तार

मताधिकार अब लगभग 10% आबादी तक पहुँच गया।

फिर भी संपत्ति, शिक्षा और कर आधारित शर्तें बनी रहीं।

5. संघीय न्यायालय

1937 में फेडरल कोर्ट (Federal Court) की स्थापना की गई।

यह आज के सुप्रीम कोर्ट की पूर्ववर्ती संस्था थी।

6. लोक सेवा आयोग

केंद्रीय लोक सेवा आयोग के साथ-साथ प्रांतीय लोक सेवा आयोगों का भी प्रावधान किया गया।

आलोचना और महत्व
भारत को “डोमिनियन स्टेटस” (पूर्ण स्वशासन) देने का वादा पूरा नहीं किया गया।
केंद्र पर अब भी वायसराय और ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण रहा।
सांप्रदायिक निर्वाचक मंडल जारी रहे।

फिर भी, 1935 का अधिनियम भारतीय संविधान का सबसे बड़ा आधार माना जाता है, क्योंकि संविधान निर्माताओं ने इसके कई प्रावधानों को अपनाया।

निष्कर्ष
भारत सरकार अधिनियम 1919 और 1935 दोनों ही भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के दबाव का परिणाम थे।
1919 ने भारतीयों को राजनीतिक प्रयोग का अवसर दिया।
1935 ने उन्हें स्वशासन की ओर ठोस कदम बढ़ाने का मौका दिया।
यही कारण है कि संविधान सभा ने भारतीय संविधान बनाते समय इन अधिनियमों से कई बातें लीं और एक पूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित की।






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