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"परिवाद की परिभाषा, प्रावधान और न्यायिक-कार्यपालक मजिस्ट्रेट में अंतर

 


परिवाद का परिचय

"परिवाद" भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण विधिक अवधारणा है। यह किसी व्यक्ति द्वारा मजिस्ट्रेट के समक्ष लिखित रूप में किया गया ऐसा अभिकथन है, जिसका उद्देश्य किसी ज्ञात या अज्ञात व्यक्ति के विरुद्ध अपराध का संज्ञान लेने का अनुरोध करना होता है।

पहले परिवाद को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 (घ) के अधीन परिभाषित किया गया था।

अब इसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 2(1) (ज)के अधीन अपबंधित किया गया है

परिवाद का अर्थ है- किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष मौखिक लिखित रूप से किया गया ऐसा अभी कथन जिसका उद्देश्य इस संहिता के अंतर्गत कार्यवाही करना हो कि किसी ज्ञात या अज्ञात व्यक्ति ने कोई अपराध किया है परंतु इसमें पुलिस रिपोर्ट शामिल नहीं है

स्पष्टीकरण- किसी ऐसे मामले में पुलिस अधिकारी द्वारा की गई रिपोर्ट, जिसमें अन्वेषण के पश्चात् असंज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट होता है, परिवाद समझी जाएगी; और वह पुलिस अधिकारी, जिसके द्वारा ऐसी रिपोर्ट की गई है, परिवादी समझा जाएगा;

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215(1) (क)>

यह धारा पहले दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के रूप में उपबंधित थी।

यह धारा लोक सेवकों के वैध प्राधिकार की अवमानना, लोक न्याय के विरुद्ध अपराध तथा साक्ष्य में दिये गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिये अभियोजन से संबंधित प्रावधान बताती है।

उपधारा 1(क) के अनुसार, कोई भी न्यायालय निम्नलिखित का संज्ञान नहीं लेगा:

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 206-223 (धारा 209 के सिवाय) के अधीन अपराध।

इसमें प्रत्यक्ष अपराध, ऐसे अपराधों के लिये दुष्प्रेरण और ऐसे अपराध करने के लिये आपराधिक षडयंत्र शामिल हैं।

संज्ञान केवल निम्नलिखित द्वारा परिवाद किये जाने पर ही लिया जा सकता है:

  • संबंधित लोक सेवक।
  • प्रशासनिक रूप से अधीनस्थ लोक सेवक।
  • संबंधित लोक सेवक द्वारा प्राधिकृत लोक सेवक।

न्यायिक मजिस्ट्रेट और कार्यपालक मजिस्ट्रेट के बीच अंतर

पल्लू कार्यपालक मजिस्ट्रेट (भा.ना.सु.सं. की धारा 14) न्यायिक मजिस्ट्रेट (भा.ना.सु.सं. की धारा 9)
नियुक्ति प्राधिकारी राज्य सरकार द्वारा नियुक्त पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति उच्च न्यायालय द्वारा की जाती है.
नियुक्ति का दायरा राज्य सरकार किसी जिले में किसी भी संख्या में कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकती है उच्च न्यायालय राज्य सरकार के परामर्श से आवश्यक संख्या में न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालयों की स्थापना करता है
अधिकारियों का पदनाम इसमें जिला मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट आदि शामिल हैं इसमें प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट और न्यायिक मजिस्ट्रेटों के विशेष न्यायालय शामिल हैं
रिक्ति प्रबंधन रिक्त जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय के अस्थायी उत्तराधिकारी राज्य के आदेश तक सभी शक्तियों का प्रयोग करते हैं धारा 9 में स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया गया है
शक्तियां और कर्त्तव्य राज्य सरकार के निर्देशों द्वारा शासित, जो जिला मजिस्ट्रेट को भी शक्तियां सौंप सकती है प्रवृत्त विधि के अधीन उच्च न्यायालय द्वारा प्रदत्त न्यायिक कार्यों और शक्तियों द्वारा शासित
क्षेत्राधिकार राज्य सरकार अधिसूचना के माध्यम से उप-विभागों का निर्धारण और नियंत्रण कर सकती है विशिष्ट स्थानीय क्षेत्रों के लिये अधिकार क्षेत्र निर्धारित किया जा सकता है, तथा विशिष्ट मामलों या मामलों के वर्गों के लिये विशेष न्यायालय स्थापित किये जा सकते हैं
अन्य संस्थाओं द्वारा नियंत्रण राज्य सरकार पुलिस आयुक्त को कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान कर सकती है संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालयों को सौंपे गए मामलों के लिये क्षेत्राधिकार अनन्य एवं स्वतंत्र है
परामर्श आवश्यकता नियुक्ति के लिये न्यायपालिका से परामर्श की कोई आवश्यकता नहीं है स्थापना और कार्यप्रणाली के लिये उच्च न्यायालय से परामर्श की आवश्यकता होती है
प्राथमिक कार्य विधि और व्यवस्था बनाए रखने से संबंधित प्रशासनिक और कार्यकारी कार्य न्यायिक कार्य, जिसमें निर्दिष्ट क्षेत्राधिकार के भीतर सिविल और आपराधिक दोनों प्रकार के मामलों को सुनवाई शामिल है

बी.एन. जॉन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2025) के मामले की पृष्ठभूमि

बी.एन. जॉन (अपीलकर्ता) संपूर्ण डेवलपमेंट इंडिया नामक एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा संचालित एक छात्रावास के स्वामी और प्रबंधक थे, जो वंचित बच्चों के लिये आवास और शिक्षा सुविधाएँ प्रदान करता था।

अपीलकर्ता के अनुसार, के.वी. अब्राहम नामक व्यक्ति ने व्यक्तिगत विवादों के कारण उसके विरुद्ध छह झूठे मामले दर्ज कराए थे। इनमें से चार मामलों में उसे दोषमुक्त कर दिया गया, जबकि दो मामलों में उसे दोषमुक्त करने की अर्जी लंबित है।

3 जून 2015 को अधिकारियों ने कथित तौर पर अब्राहम के कहने पर अपीलकर्त्ता के छात्रावास पर छापा मारा, जिसमें दावा किया गया कि छात्रावास किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के प्रावधानों का पालन नहीं कर रहा था।

अधिकारियों ने बच्चों को छात्रावास से अन्य स्थानों पर स्थानांतरित करने का प्रयास किया, उनका दावा था कि छात्रावास सक्षम प्राधिकारियों से उचित अनुमति के बिना संचालित हो रहा था।

अपीलकर्त्ता और उसकी पत्नी के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 353 के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई।

अपीलकर्ता को 8 जून 2015 को गिरफ्तार किया गया था, परंतु उसी दिन उसे जमानत दे दी गई थी।

अन्वेषण के पश्चात्, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, वाराणसी के समक्ष अपीलकर्त्ता पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 353 और धारा 186 के अधीन आरोप-पत्र दायर किया गया।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया और अपीलकर्ता को समन जारी किया।

अपीलकर्ता ने समन आदेश को वापस लेने के लिये आवेदन दावा किया, जो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित रहा।

तत्पश्चात्, अपीलकर्ता ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और मामले में आरोप-पत्र, संज्ञान आदेश और सभी कार्यवाही को रद्द करने की मांग की।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता की याचिका खारिज कर दी, जिसके पश्चात् उसने उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की।

न्यायालय की टिप्पणियां

उच्चतम न्यायालय ने प्रेक्षित किया किः

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 186 के अधीन आरोपः

  • यह प्रेक्षित किया गया कि भारतीय दण्ड संहिता की धाता 186 के अधीन अपराधों के संज्ञान के लिये संबंधित लोक सेवक द्वारा न्यायिक मजिस्ट्रेट को लिखित परिवाद की आवश्यकता होती है।
  • यह पाया गया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसा कोई परिवाद दर्ज नहीं किया गया था।
  • यह उल्लेख किया गया कि सिटी मजिस्ट्रेट (कार्यपालक मजिस्ट्रेट) को किया गया परिवाद विधिक अनिवार्यता को पूरा नहीं करता।

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 353 के अधीन आरोपः

  • यह प्रेक्षित किया गया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में मारपीट या आपराधिक बल का कोई आरोप नहीं था, जो कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 353 के आवश्यक तत्त्व हैं।
  • यह पाया गया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में कंवल "क्षोभकारित करने" का उल्लेख किया गया था, जो कि हमले या आपराधिक बल के प्रयोग से भिन्न है।
  • ध्यान देने वाली बात यह है कि साक्षियों के कथनों में पश्चात् में लगाए गए हमले के आरोप, सोच-विचार करने के पश्चात् लगाए गए आरोप प्रतीत होते हैं।

अन्वेषण परः

  • यह पाया गया कि पुलिस ने मामले को गलत तरीके से संज्ञेय मान लिया, जबकि प्रथम सूचना रिपोर्ट में किसी संजेोषय अपराध का प्रकटन नहीं किया गया था।
  • यह प्रेक्षित किया गया कि इस प्रारंभिक विधिक दुबोलता के कारण संपूर्ण अन्वेषण प्रभावित हुआ।

उच्च न्यायालय के निर्णय परः

  • यह पाया गया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपील में उठाए गए महत्त्वपूर्ण विधिक मुद्दों की जांच नहीं की।
  • यह प्रेक्षित किया गया कि सह-अभियुक्त द्वारा पूर्ववर्ती विशेष अनुमति याचिका को खारिज करने से वर्तमान मामले में विधिक मुद्दों की जांच वर्जित नहीं हो जाती।

अंतिम टिप्पणियां:

  • यह निष्कर्ष निकाला गया कि दोनों अपराधों का मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा लिया गया संज्ञान सम्यक् प्रक्रिया के अनुरूप नहीं था।
  • पाया गया कि संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही विधिक रूप से अस्थिर थी।
  • यह निर्धारित किया गया कि यह कार्यवाही को रद्द करने के लिये शक्तियों का प्रयोग करने हेतु उपयुक्त मामला था।

इन टिप्पणियों के कारण उच्चतम न्यायालय ने अंततः अपील को स्वीकार कर लिया तथा अपीलकर्ता के विरुद्ध सभी कार्यवाही रद्द कर दी।


बी.एन. जॉन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य के मामले में उद्धृत ऐतिहासिक मामले

हरियाणा राज्य बनाम चौधरी भजन लाल (1992):

प्रथम सूचना रिपोर्ट/परिवाद/आपराधिक मामलों को कब रद्द किया जा सकता है, इससे संबंधित प्रमुख सिद्धांत स्थापित किये गए।

सात श्रेणियाँ निर्धारित की गई, जिनमें न्यायालय दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अधीन शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं।

प्रमुख सिद्धांत शामिल हैं:

  • जब प्रथम सूचना रिपोर्ट में लगाए गए आरोप कोई अपराध नहीं बनाते।
  • जब प्रथम सूचना रिपोर्ट में संज्ञेय अपराध का प्रकटन नहीं होता।
  • जब निर्विवाद आरोपों से अपराध का खुलासा नहीं होता।
  • जब प्रथम सूचना रिपोर्ट केवल असंज्ञेय अपराध का गठन करती है।
  • जब आरोप असंगत और स्वाभाविक रूप से असंभाव्य हों।
  • जब कार्यवाही पर कोई विधिक रोक हो।
  • जब कार्यवाही दुर्भावना से ग्रसित होकर संस्थित की जाती है।

गुलाम अब्बास बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1981):

  • न्यायिक मजिस्ट्रेट और कार्यपालक मजिस्ट्रेट के बीच अंतर को स्पष्ट किया गया।
  • न्यायिक कार्यों को कार्यकारी कार्यों से पृथक् करने की व्याख्या की गई।
  • यह स्थापित किया गया कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट अपराधों का संज्ञान लेने जैसी न्यायिक शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकते।

Comments

  1. सच में अच्छा लगा पढ़कर, आसान भाषा में बढ़िया तरीके से समझाया है।

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