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अच्छादन का सिद्धांत या( ग्रहण का सिद्धां | एक सरल व्याख्या हिंदी में

यह लेख लखनऊ विश्वविद्यालय  की कानून की छात्र Dipankarshil priyadarshi ने लिखा है। यह लेख आच्छादन का सिद्धांत  (डॉक्ट्रिन ऑफ़ एक्लिप्स) के बारे में बात करता है जो एक कानूनी सिद्धांत है जिसका उपयोग मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले पूर्व-संवैधानिक कानूनों को अमान्य करने के लिए किया गया है। यह एक ऐसा सिद्धांत है जो मौलिक अधिकारों के विचारित (प्रस्तुत किया हुआ ) करने की अवधारणा को कायम रखता है। 
अच्छादन का सिद्धांत या ग्रहण का सिद्धांत | एक सरल व्याख्या हिंदी में 

परिचय।
भारतीय संवैधानिक कानून के तहत आच्छादन का सिद्धांत एक कानूनी सिद्धांत है कोई भी मौजूदा कानून जो जो मौलिक अधिकारों के विरुद्ध में हो तो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला कानून एक आच्छादन की स्थिति में रहता है जो इसे निष्क्रिय और अप्रवर्तनीय बना देता है। इस लेख केl माध्यम से PCS.J., LL.B., LL.M., एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से भारतीय राजव्यवस्था विषय के अंतर्गत आने वाले आच्छादन का सिद्धांत (Doctrine of Eclipse in Hindi) का अध्ययन के बारे दिया गया है।

व्याख्या अनुच्छेद के साथ_

अनुच्छेद 13 (खंड 1) संविधान लागू होने के पूर्व जो कानून थे यदि संविधान लागू होने के बाद वह मूल अधिकारों के विरोध में हो तो जहां तक वह उनके विरोध में है वहां तक सुने होंगे
अच्छादन का सिद्धांत यह सिद्धांत अनुच्छेद 13 (खंड 1) पर आधारित है इस सिद्धांत के अनुसार ऐसा कानून जो संविधान के पूर्व बनाए गए थे वह संविधान लागू होने के बाद यदि मूल अधिकारों के विरोध में हो तो वह प्रारंभ से शून्य नहीं होंगे ऐसे कानून केवल मूल अधिकारों के कारण कुछ समय के लिए ही खत्म होते हैं 
महत्वपूर्ण वाद
 भिका जी बनाम मध्य प्रदेश राज्य 1955
 संविधान से पूर्व बरार मोटरसाइकिल अधिनियम 1947 लागू किया गया था जिसे राज्य को मोटर व्यापार को जप्त करने की शक्ति दे दी गई थी किंतु संविधान लागू होने के बाद वह पूरी तरह से शून्य हो गया क्योंकि 1951 में प्रथम संविधान  संशोधन से अनुच्छेद 19 का (खंड 1) में संशोधन करके राज्य को किसी भी कारोबार व्यापार पर एकाधिकार दे दिया। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जो कानून अधिकारों का उल्लंघन कर रहा था यदि संशोधन करके उसे मूल अधिकार में ही परिवर्तन कर दिया जाए तो ऐसे कानून को फिर से बनाने की जरूरत नहीं होती।

अनुच्छेद 13 (खंड 2) राज्य कोई ऐसी विधि नहीं बनाएगा जो संविधान के अध्याय 3 में दिए गए मूल अधिकारों को काम करता हो या छिनता हो। ऐसा कानून प्रारंभ से ही शून्य होगा उसे संशोधन करके भी लागू नहीं किया जा सकता ऐसा कानून को फिर से पारित करना होगा ।
अनुच्छेद 13 के खंड 1 और खंड 2 में अंतर
खंड 1 में बनाया गया कानून प्रारंभ से ही सुनते नहीं होता है ना ही उसे संविधान संशोधन करके फिर से पारित करने की जरूरत होती है जबकि खंड 2 में बनाया गया कानून प्रारंभ से ही शून्य होते हैं यदि उन्हें लागू करना है तो फिर से बनाने की जरूरत पड़ती है।
महत्वपूर्ण प्रश्न ?
 1.क्या अच्छा धन का सिद्धांत संविधान के बाद बनाई गई विधियों पर लागू होता है या नहीं ??

महत्वपूर्ण वाद
सगीर अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह सिद्धांत संविधान के बाद बनाई गई वीडियो पर लागू नहीं होता
दीपचंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य उच्चतम न्यायालय ने सगीर अहमद के वाद के निर्णय को देखते करते हुए कहा कि ऐसी विधियां प्रारंभ से ही सुनने होगी।
गुजरात राज्य बनाम अंबिका मिल उच्चतम न्यायालय ने दीपचंद्र मामले में दिए गए निर्णय को काफी बदल दिया और कहा कि मूल अधिकार केवल नागरिकों कोई प्राप्त है ना कि सभी को जिन्हें मूल अधिकार प्राप्त नहीं है यदि उनके संबंध में लागू होने के बाद कोई विधि बनाई जाए तो उसके शून्य होने का कोई प्रश्न नहीं उठाता। 
दुलारी लोड बनाम थर्ड एडिशनल जज कानपुर आच्छादन का सिद्धांत संविधान के बाद बनाई गई विधियों पर लागू होगा । भले ही नागरिकों से संबंधित क्यों ना हो



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