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Showing posts from August, 2025

संविधान सभा का गठन (Formation of Constituent Assembly)

भारत का संविधान लिखित और निर्मित संविधान है। इसे बनाने के लिए एक विशेष संस्था बनाई गई, जिसे संविधान सभा (Constituent Assembly) कहा जाता है। इस पोस्ट में हम संविधान सभा की मांग, गठन की प्रक्रिया, चुनाव पद्धति और इसकी आलोचना पर चर्चा करेंगे। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अंग्रेजों का शासन भारत में कंपनी शासन (1757–1857) से शुरू हुआ। इस दौरान कोई लिखित संविधान नहीं था। गवर्नर/गवर्नर जनरल ही कानून बनाते थे। 1857 की क्रांति के बाद सत्ता ब्रिटिश क्राउन के हाथ में आ गई। समय-समय पर कई अधिनियम आए – इनमें सबसे महत्वपूर्ण था भारत शासन अधिनियम, 1935। आज़ादी के समय और संविधान सभा के गठन तक शासन इसी अधिनियम के आधार पर चल रहा था। संविधान सभा की मांग कैसे उठी? 1895-96: संविधान जैसी सोच सामने आई। 1922: महात्मा गांधी ने कहा – भारत का संविधान भारतीयों की इच्छा से बने। 1934: M.N. Roy ने पहली बार सीधे संविधान सभा की मांग की। 1935: कांग्रेस ने इसे आधिकारिक रूप से स्वीकार किया। अंग्रेजों द्वारा स्वीकार करना 1940 – अगस्त प्रस्ताव (August Offer): पहली बार अंग्रेजों ने सिद्धांत रूप में मान लिया कि भारत में संविधान सभा हो ...

भारत सरकार अधिनियम 1919 और 1935 : भारतीय संविधान की नींव

भारतीय संवैधानिक विकास का इतिहास केवल घटनाओं का क्रम नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष की कहानी है जिसमें भारतीय जनता ने धीरे-धीरे अपने अधिकारों की मांग की और ब्रिटिश सरकार को सुधार लागू करने पर मजबूर किया। इस यात्रा में भारत सरकार अधिनियम 1919 और भारत सरकार अधिनियम 1935 दो ऐसे मील के पत्थर हैं, जिन्होंने आधुनिक भारतीय संविधान की नींव तैयार की। 1919 का भारत सरकार अधिनियम (Montagu-Chelmsford Reforms) पृष्ठभूमि 1909 का मार्ले-मिंटो सुधार अल्पसंख्यकों को पृथक निर्वाचन मंडल देने तक ही सीमित था। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ही इससे असंतुष्ट थीं। 1916 में लखनऊ पैक्ट हुआ, जिसने हिंदू-मुस्लिम एकता की नई राह दिखाई। होम रूल मूवमेंट (एनी बेसेंट और तिलक) ने ब्रिटिश शासन पर दबाव बढ़ाया। प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के दौरान भारत ने ब्रिटेन का साथ दिया और इसके बदले में भारतीयों को कुछ राजनीतिक अधिकार मिलने की उम्मीद जगी। इन्हीं परिस्थितियों में भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू और वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने 1917 में घोषणा की कि भारत में “उत्तरदायी शासन” की ओर धीरे-धीरे कदम बढ़ाए जाएंगे। प्रमुख प्रावधान 1. कें...

भारतीय परिषद अधिनियम 1861 Indian Councils Act 1861 in Hindi

नमस्कार दोस्तों, संवैधानिक विकास (Constitutional Development) के क्रम में आज हम बात करेंगे भारतीय परिषद अधिनियम 1861 की। यह अधिनियम बेहद अहम है क्योंकि इसके ज़रिए पहली बार भारतीयों को शासन की प्रक्रिया में शामिल किया गया। 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार को समझ आ गया था कि बिना भारतीयों के सहयोग के भारत पर शासन लंबे समय तक संभव नहीं है। यही कारण था कि 1858 में जब कंपनी का शासन समाप्त हुआ और भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आया, तब “सहयोग की नीति” (Policy of Association) को अपनाया गया। इस नीति की झलक हमें सबसे पहले 1861 के इस अधिनियम में दिखाई देती है। 1. केंद्रीय विधान परिषद (Central Legislative Council) में परिवर्तन 1833 के एक्ट में गवर्नर जनरल + 4 सदस्यों की कार्यकारिणी बनाई गई थी। 1853 में इसमें 12 सदस्य जोड़कर केंद्रीय विधान परिषद बनाई गई, पर उसमें कोई भारतीय नहीं था। अब 1861 के अधिनियम में गवर्नर जनरल को अधिकार दिया गया कि वह 6 से 12 अतिरिक्त सदस्य नियुक्त करे। शर्त यह रखी गई कि इनमें से आधे सदस्य भारतीय होंगे। इन भारतीय सदस्यों को वास्तविक अधिकार नहीं दिए गए, बल्क...

चार्टर एक्ट 1853

पृष्ठभूमि चार्टर एक्ट 1833 से कंपनी के व्यापारिक अधिकार लगभग खत्म कर दिए गए थे। अब सवाल यह था कि कंपनी का शासन कब तक भारत में जारी रहेगा? संसद का इरादा साफ़ था – कंपनी का व्यापार भले ही खत्म हो चुका है, लेकिन उसका प्रशासनिक ढांचा ब्रिटेन के सीधे नियंत्रण में रहना चाहिए। इसी पृष्ठभूमि में 1853 का चार्टर एक्ट आया। यह एक तरह से कंपनी शासन के अंत की भूमिका था, क्योंकि कुछ साल बाद 1857 की क्रांति और फिर 1858 का भारत शासन अधिनियम आया। चार्टर एक्ट 1853 की मुख्य विशेषताएँ 1. केंद्रीय विधान परिषद का जन्म अब तक गवर्नर जनरल और उनकी चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद ही कानून बनाती थी। 1853 के एक्ट में इस परिषद को विस्तारित किया गया। कुल 12 सदस्य बनाए गए: 4 कार्यकारी सदस्य (गवर्नर जनरल की परिषद) 6 अतिरिक्त सदस्य (गैर-कार्यकारी) 2 सदस्य और जोड़ने का अधिकार इस प्रकार एक नई संस्था बनी जिसे कहा गया – केंद्रीय विधान परिषद (Central Legislative Council) 👉 महत्व : यहीं से कार्यपालिका और विधायिका का पृथक्करण शुरू हुआ। यानी गवर्नर जनरल की परिषद अब सिर्फ शासन नहीं करेगी, बल्कि कानून बनाने के लिए अलग से...

चार्टर एक्ट 1813

चार्टर एक्ट 1813 | विस्तार से समझिए भारत के इतिहास में 1813 का चार्टर एक्ट एक ऐसा कानून था जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी की ताक़त को हिला दिया। इस एक्ट से पहले कंपनी न सिर्फ शासन कर रही थी, बल्कि भारत के व्यापार पर भी उसका पूरा नियंत्रण था। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत के लोग या ब्रिटेन के साधारण व्यापारी कंपनी की अनुमति के बिना व्यापार करने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बदलने लगीं। यूरोप में नेपोलियन के युद्ध चल रहे थे। ब्रिटेन और फ्रांस की दुश्मनी ने यूरोप का व्यापार अस्त-व्यस्त कर दिया था। ऊपर से औद्योगिक क्रांति के कारण ब्रिटेन की फैक्ट्रियों से माल तो बहुत बन रहा था, लेकिन उसे बेचने के लिए बड़े बाज़ार नहीं मिल रहे थे। ऐसे में ब्रिटिश व्यापारियों ने संसद पर दबाव बनाया कि अब भारत का व्यापार सिर्फ कंपनी के हाथ में नहीं रहना चाहिए। यानी पृष्ठभूमि साफ़ थी – ब्रिटेन को नए बाज़ार चाहिए थे और भारत सबसे बड़ा विकल्प था। इसी माहौल में 1813 का चार्टर एक्ट पास किया गया। इस एक्ट की मुख्य बातें 1.  का एकाधिकार समाप्तकंपनी सबसे बड़ा बदलाव यही था। अब भारत और...

संवैधानिक विकास (भाग-2) : पिट्स इंडिया एक्ट, 1784

नमस्ते दोस्तों 👋 Thefreshlaw में आपका स्वागत है। पिछले लेख में हमने रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के बारे में लिखा था। आज हम उसके अगले पड़ाव पर चलते हैं और समझते हैं कि आखिर क्यों आया था पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 और इससे भारत के प्रशासन में क्या बदलाव हुए। क्यों ज़रूरी था पिट्स इंडिया एक्ट? रेगुलेटिंग एक्ट और 1781 के सुधारों से ब्रिटेन ने भारत पर नियंत्रण की शुरुआत तो कर दी थी, लेकिन ये व्यवस्था थोड़ी अस्थायी और अधूरी साबित हुई। ब्रिटेन चाहता था कि भारत पर उसका सीधा और स्थायी नियंत्रण रहे। इसी वजह से प्रधानमंत्री विलियम पिट ने 1784 में एक नया कानून पास करवाया, जिसे इतिहास में हम पिट्स इंडिया एक्ट के नाम से जानते हैं। इस एक्ट के बड़े फैसले 1. कंपनी पर स्थायी पकड़ पहले तक कंपनी के सारे काम "कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स" देखती थी। अब इस एक्ट ने कंपनी के काम को दो हिस्सों में बाँट दिया: व्यापारिक काम – कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स संभालेगी राजनीतिक और प्रशासनिक काम – नई संस्था बोर्ड ऑफ कंट्रोल के हाथों में होंगे 👉 इसे ही "Dual Government" यानी दोहरे शासन की शुरुआत कहा गया। 2. बोर्...

ईस्ट इंडिया कंपनी और प्रारंभिक चार्टर एक्ट्स (1600 – 1773

मैं  Dipankarshil Priyadarshi आप है thefreshlaw  के प्लेटफॉर्म पर ,आज का लेख है ईस्ट इंडिया कंपनी और उसके चार्टर एक्ट्स के बारे में, जो भारत के संवैधानिक विकास को समझने में बहुत महत्वपूर्ण हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना (1600) ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना दिसंबर 1600 में ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम द्वारा जारी चार्टर के माध्यम से की गई थी। इस चार्टर ने कंपनी को पंद्रह वर्षों तक पूर्वी देशों (East Indies) के साथ व्यापार करने का विशेष एकाधिकार (monopoly) अधिकार दिया। यह कंपनी लंदन के व्यापारियों द्वारा बनाई गई थी और धीरे-धीरे भारत सहित एशिया के कई हिस्सों में व्यापार करने लगी। कंपनी का प्रारंभिक कार्यक्षेत्र भारत में कंपनी ने अपना पहला व्यापारिक केंद्र सूरत (गुजरात) में स्थापित किया। धीरे-धीरे कंपनी ने बंबई (मुंबई), मद्रास (चेन्नई) और कलकत्ता (कोलकाता) में अपनी प्रेसिडेंसी (Presidency) स्थापित की। इन्हीं तीन प्रेसिडेंसी से कंपनी ने भारत में अपना प्रभाव बढ़ाया। चार्टर एक्ट 1726 जैसे-जैसे कंपनी का व्यापार बढ़ा, ब्रिटेन की संसद ने 1726 का चार्टर एक्ट पारित किय...

भारत में संवैधानिक विकास और constitutional विचारधारा

हेलो  फ्रेंड्स Thefreshlaw में एक बार फिर से आपका स्वागत है। टॉपिक है भारत में संवैधानिक विकास कांस्टीट्यूशनल विचारधारा। यह आज की हमारी लेख का टॉपिक है। जैसे कि हम कांस्टीट्यूशन एंड पॉलिटिकल सिलेबस में पढ़ेंगे कि भारत का संविधान कैसे बनेगा और इससे पहले हम भारत का संविधान पढ़ चुके हैं लेकिन पहले भारत में फिर से संविधान की स्थापना हुई थी जो कि भारत में बनी थी। शासन प्रशासन और प्रणाली का प्रभाव शासन प्रशासन और प्रणाली का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा यानी कि हमारा संविधान बनने से पहले जब ब्रिटेन का भारत में शासन था उस समय जो कानून यहां के कानून बंद करके चले गए थे या फिर जो कानून यहां के वायस या गवर्नर-जनरल ने बनाए थे, उन सभी का हमारे संविधान पर बहुत प्रभाव है। जो भी संस्थाएं हैं जैसे कि न्यायालय या संसद जो भी पार्टियां हैं, उन्होंने अपने शासन के दौरान धीरे-धीरे डिवेलप किया कि उन्होंने हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत बनाया, जो कि भारत के संविधान का हिस्सा है। संवैधानिक विकास का अध्ययन हमारे सिलेबस में कांस्टीट्यूशनल वीडियोग्राफी इतिहास में भी आपको संवैधानिक विकास के बारे में पता चलता ह...

संविधान और संविधानवाद: अंतर, महत्व और भारत में स्थिति

हेलो फ्रेंड्स, theFreshlaw में आपका स्वागत है। आज हम चर्चा करेंगे कि संविधान और संविधानवाद में क्या अंतर है। क्या दोनों एक ही चीज़ हैं? क्या संविधान के होते हुए भी संविधानवाद नहीं हो सकता? और भारत में संविधानवाद किस स्तर तक मौजूद है? 1. संविधान क्या है?  संविधान किसी भी देश का सर्वोच्च कानून होता है। यह देश के शासन की रूपरेखा तय करता है और यह किसी भी अन्य कानून से ऊपर होता है। सरकार जब भी कोई नया कानून बनाती है, तो उसका आधार संविधान होना चाहिए। संविधान में यह स्पष्ट किया जाता है कि देश का शासन कैसा होगा, सत्ता किसके हाथ में होगी, नागरिकों के अधिकार क्या होंगे, और राज्य की शक्तियों की सीमाएं क्या होंगी।  2. संविधानवाद क्या है?  संविधानवाद एक ऐसी विचारधारा है, जिसमें कहा जाता है कि केवल संविधान होना ही पर्याप्त नहीं है। संविधान में कुछ मूल्य (Values) और आदर्श (Principles) होने जरूरी हैं, ताकि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कर सके और एक न्यायपूर्ण शासन स्थापित कर सके। यानी, अगर किसी देश में संविधान है, सरकार संवैधानिक है और वह संविधान के अनुसार शासन करती है — फ...

भारत का संविधान: क्या यह संघात्मक है या एकात्मक? जानिए विस्तार से

नमस्कार फ्रेंड्स, Thefreshlaw में एक बार फिर से आपका हार्दिक स्वागत है। आज की इस महत्वपूर्ण लेख में हम चर्चा करने जा रहे हैं — "एकात्मक और संघात्मक संविधान तथा सरकार की विश्लेषणात्मक व्याख्या"।  भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों में शासन व्यवस्था मुख्यतः दो रूपों में देखने को मिलती है — एकात्मक (Unitary) और संघात्मक (Federal)। इन दोनों शासन व्यवस्थाओं की अपनी-अपनी विशेषताएँ, लाभ और कमियाँ हैं। इस लेख में हम इन दोनों व्यवस्थाओं को विस्तार से समझेंगे। यह विषय भारतीय संविधान, राजनीति विज्ञान और सामान्य ज्ञान के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भूमिका   भारत जैसे विविधता भरे देश में संविधान की भूमिका सिर्फ कानूनों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा मार्गदर्शक है जो देश की संरचना, उसकी सरकार, नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। जब हम सरकार की बात करते हैं तो वह संविधान की संरचना के अनुरूप होती है। अर्थ  'संघ शासन' शब्द के लैटिन शब्द ' फोएडस'  (foedus) से लिया गया है, जिसका अभिप्राय है संधि या 'समझौता'  संघीय शा...

अनुमोदनार्थ या विक्रय-वापसी पर भेजे गए माल में Ownership कब Transfer होता है? | Section 24 Explained in Hindi

हैलो दोस्तों स्वागत है इस पोस्ट में आज हम जानेंगे की स्वामित्व का अंतरण कब होता है 🫴  भारतीय विक्रय-वस्तु अधिनियम, 1930 (Sale of Goods Act, 1930) के अंतर्गत माल के स्वामित्व (Ownership) का अंतरण केवल तभी होता है जब कुछ विशेष शर्तें पूरी की जाती हैं। एक ऐसी स्थिति जो अक्सर सामने आती है, वह है जब कोई वस्तु "अनुमोदनार्थ" (for approval) या "विक्रय या वापसी के लिए" (sale or return basis) दी जाती है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि स्वामित्व (ownership) कब और कैसे क्रेता (buyer) को हस्तांतरित होता है? आइए इसे विस्तारपूर्वक समझें। 🧾 कानूनी प्रावधान का सारांश: जब कोई वस्तु क्रेता को अनुमोदनार्थ या "विक्रय या वापसी के लिए" या अन्य समान शर्तों पर दी जाती है, तो उस वस्तु की मालिकाना हक (ownership) केवल निम्न स्थितियों में ही हस्तांतरित होता है: 🔹 ( क) जब क्रेता माल को स्वीकार करता है: जब ग्राहक (क्रेता) खुले रूप में यह सूचित करता है कि वह माल को स्वीकार कर रहा है, या वह ऐसा कोई कार्य करता है जिससे यह स्पष्ट होता है कि उसने उस माल को स्वीकार कर लिया है, जैसे म...

संविधान और राज्य-व्यवस्था: समझें इन दोनों के बीच का बुनियादी अंतर

हेलो हेलो फ्रेंड्स! The Fresh Law में एक बार फिर आपका स्वागत है। आज की पोस्ट में हम बात करेंगे संविधान और राज्य-व्यवस्था की। यह दोनों शब्द सिविल सर्विस या किसी भी लॉ परीक्षा की तैयारी करने वालों के सिलेबस में आते हैं, लेकिन अक्सर इन्हें एक ही समझ लिया जाता है। जबकि, इन दोनों में गहरा अंतर है। आइए, इस क्लास के माध्यम से इसे विस्तार से समझते हैं। संविधान और राज्य-व्यवस्था एक नहीं हैं अगर आप यह मानकर चल रहे हैं कि संविधान और राज्य व्यवस्था एक ही चीज है, तो आप एक बड़ी गलती कर रहे हैं। यह दोनों भले ही एक-दूसरे से संबंधित हों, लेकिन दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं। संविधान क्या है? 1. संविधान का सरल अर्थ मान लीजिए कि जैसे घर में कुछ परंपराएं, नियम और व्यवहार होते हैं जिनके आधार पर घर चलता है, वैसे ही किसी देश को चलाने के लिए भी एक संकलन की आवश्यकता होती है। उसी संकलन को संविधान कहा जाता है। यह संकलन नियमों, कानूनों, परंपराओं, आदर्शों और सिद्धांतों का होता है, जो शासन के लिए आवश्यक होते हैं। संविधान लिखित भी हो सकता है और अलिखित भी। 2. संविधान की विशेषताएं लिखित संविधान: भारत का सं...

केन्द्र बनाम राज्य: भारतीय संविधान में शक्तियों का बंटवारा और महत्वपूर्ण केस लॉ

भारतीय संविधान में केन्द्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण का प्रावधान अनुच्छेद 245 में किया गया है। इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच अधिकारों का स्पष्ट विभाजन हो, जिससे शासन-प्रणाली सुचारू रूप से चल सके और किसी भी प्रकार का टकराव न्यूनतम रहे। भारतीय संविधान एक संघीय ढांचे पर आधारित है, जिसमें शक्तियों का वितरण दो दृष्टिकोणों से किया गया है— 1. विस्तार के दृष्टिकोण से (Territorial Extent) 1. संसद की शक्ति – संसद सम्पूर्ण भारत या उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकती है। 2. राज्य विधानमण्डल की शक्ति – राज्य विधानमण्डल अपने सम्पूर्ण राज्य या उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकता है। 3. सीमा के बाहर भी प्रभाव – संसद द्वारा बनाई गई विधि केवल इस कारण अमान्य नहीं होगी कि उसका प्रभाव भारत के राज्य क्षेत्र से बाहर भी पड़ता है। इसी प्रकार, राज्य विधानमण्डल द्वारा बनाई गई विधि राज्य के बाहर भी लागू हो सकती है, बशर्ते विषय और राज्य के बीच पर्याप्त संबंध हो। 4. व्यावहारिक कठिनाई – यद्यपि सिद्धांत रूप से यह संभव है, लेकिन व्यवहार में...

अनुच्छेद 22: गिरफ्तारी और नजरबंदी में आपके अधिकार

कभी आपने टीवी शोज़ या फिल्मों में देखा होगा कि पुलिस किसी को अचानक बिना कुछ कहे ले जाती है। स्क्रीन पर यह आम लगता है, लेकिन असल जिंदगी में भी कई बार ऐसा होता है — बिना वारंट, बिना सही कानूनी प्रक्रिया अपनाए। अधिकतर लोगों को इस बारे में सही जानकारी नहीं होती, बस चिंता होती है कि यह कानूनी है या नहीं और पुलिस के सामने क्या कहा जा सकता है। इस चिंता का एक ही समाधान है — जानकारी। आज हम बात करेंगे अनुच्छेद 22 की, जो भारतीय संविधान का एक मूल अधिकार (Fundamental Right) है और आपको State के दुरुपयोग से सुरक्षा देता है। अवैध हिरासत (Illegal Detention) क्या है? Detention का मतलब होता है किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को अस्थायी रूप से सीमित करना — यानी Arrest। गिरफ्तारी अपने आप में अवैध नहीं है, लेकिन जब पुलिस कुछ कानूनी सुरक्षा उपाय (Legal Safeguards) का पालन नहीं करती, तो यह अवैध हो जाती है। उदाहरण : बिना आवश्यक वारंट के गिरफ्तारी गिरफ्तारी का कारण न बताना परिवार को सूचना न देना गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश न करना इनमें से कोई भी शर्त पूरी न होने पर यह Illegal Detentio...

सुप्रीम कोर्ट में "Age of consent" पर बड़ी बहस

 हम सुप्रीम कोर्ट में चल रहे एक बहुत ही इंपोर्टेंट केस में एक बहुत ही इंपोर्टेंट इशु के बारे में बात करने वाले हैं। इस चीज़ के बारे में है हमारे देश में जो मिनिमम ऐज़ है जो सबसे कम उम्र में यौन संबंध बनाती है उससे क्या छुटकारा पाना चाहिए? आज की सिचुएशन में देखें अगर आप देखें तो हमारे देश में जो मिनिमम ऐज अलाउड है वह 18 साल से यौन संबंध बना रही है। मतलब 18 साल से कम उम्र का व्यक्ति अगर यौन संबंध बनाता है तो ऐसे में केस हो जाता है। पॉक्सो का मामला होता है । भारतीय न्याय संहिता में केस हो जाता है । तो इसलिए सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से ये छात्रवृत्ति चल रही है कि एज ऑफ कंसेंट कितना रुका जाए? 18 साल का एडिट क्या रखा जाए या एडिट कम कर दिया जाए? अब कम करने का सवाल देखिए लोगों के दिमाग में ऐसा आ रहा है। अवलोकन आपको पता है कि टीनाएज तीर्थयात्रियों के बहुत बड़े पैमाने पर राष्ट्रमंडल हो गए हैं। है ना? 13 साल, 14 साल, 15 साल, 16 साल के जो बच्चे होते हैं उनमें से एक भी मोटरसाइकिल पर सवार होते हैं। ये लोग भी ट्रैवल्स में होते हैं। और अक्सर उस लैपटॉप के साथ ये लोग क्या करते हैं? बाए...

"परिवाद की परिभाषा, प्रावधान और न्यायिक-कार्यपालक मजिस्ट्रेट में अंतर

  परिवाद का परिचय "परिवाद" भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण विधिक अवधारणा है। यह किसी व्यक्ति द्वारा मजिस्ट्रेट के समक्ष लिखित रूप में किया गया ऐसा अभिकथन है, जिसका उद्देश्य किसी ज्ञात या अज्ञात व्यक्ति के विरुद्ध अपराध का संज्ञान लेने का अनुरोध करना होता है। पहले परिवाद को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 (घ) के अधीन परिभाषित किया गया था। अब इसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 2(1) (ज)के अधीन अपबंधित किया गया है परिवाद का अर्थ है- किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष मौखिक लिखित रूप से किया गया ऐसा अभी कथन जिसका उद्देश्य इस संहिता के अंतर्गत कार्यवाही करना हो कि किसी ज्ञात या अज्ञात व्यक्ति ने कोई अपराध किया है परंतु इसमें पुलिस रिपोर्ट शामिल नहीं है स्पष्टीकरण- किसी ऐसे मामले में पुलिस अधिकारी द्वारा की गई रिपोर्ट, जिसमें अन्वेषण के पश्चात् असंज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट होता है, परिवाद समझी जाएगी; और वह पुलिस अधिकारी, जिसके द्वारा ऐसी रिपोर्ट की गई है, परिवादी समझा जाएगा; भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215(1) (क) > यह धारा पहले दण...