Skip to main content

Posts

Showing posts from October, 2023

भारत का नाम कैसे पड़ा? जानिए भारतवर्ष की पहचान और इतिहास

भारत का इतिहास  उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैला यह महाद्वीप भारतवर्ष के नाम से ज्ञात है जिसे महाकाव्य तथा पुराणों में " भारतवर्ष 'अर्थात भरतों का देश तथा यहां के निवासियों को भारतीय अर्थात भरत की संतान कहा गया है। भारत एक प्राचीन कबीले का नाम था प्राचीन भारतीय अपने देश को जम्मू द्वीप  अर्थात जंबू (जमुना) वृछो का द्वीप कहते थे। प्राचीन ईरानी इसे सिंधु नदी के नाम से जोड़ने थे जिसे वे सिंधु न कह कर हिंदू कहते थे। यही नाम फिर पूरे पश्चिम में फैल गया।  और पूरे देश को इसी एक नदी के नाम से जाना जाने लगा। यूनानी इसे हिंदे और अब इसे हिंद कहते थे। मध्यकाल में इस देश को हिंदुस्तान कहा जाने लगा यह शब्द भी फारसी शब्द हिंदू से बना है यूनानी भाषा के हिंदे के आधार पर अंग्रेज ईसे इंडिया कहने लगे । बिंध्य की पर्वत श्रेणी श्रृंखला देश को उत्तर और दक्षिण, दो भागों में बांटती है। उत्तर में इंडो यूरोपिय परिवार की भाषाएं बोलने वालों की और दक्षिण में द्रविड़ परिवार की भाषाएं बोलने वालों का बहुमत है। Note: भारत की जनसंख्या का निर्माण जिन प्रमुख नस्लो के लोगों के ...

महाधिवक्ता (advocate General)

परिचय-  यह लेख लखनऊ विश्वविद्यालय कानून का छात्र दीपांकारशील प्रियदर्शी द्वारा लिखा गया है जिसमें राज्य के महाधिवक्ता की शक्तियां और कार्य और विशेष अनुच्छेद के बारे में प्रावधान है। महाधिवक्ता (Advocate General)- राज्य के महाधिवक्ता के बारे में सविंधान के अनूच्छेद 165 में प्रावधान किया गया है। वह राज्य का सर्वोच्च कानूनी अधिकारी होता है और जिस तरह से भारत सरकार के लिए महान्यायवादी का पद होता है उसी प्रकार से राज्य के लिए राज्य के महाधिवक्ता का पद होता है। महाधिवक्ता की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा होती है। योग्यता- महाधि वक्ता के पद पर नियुक्ति होने केलि ए व्यक्ति में उच्चन्यायालय के न्यायाधीश बनने की योग्यता होनी चाहिए। साधारण शब्दों में महाधिवक्ता में निम्नलि खित योग्यताएं होनी जरूरी है- 1) वह भारत का नागरिक होना चाहिए। 2) वह 5 वर्ष तक न्यायिक अधिकारी या उच्च न्यायालय में10 वर्षों तक वकालत करने का अनभुव होना चाहिए। महाधिवक्ता का कार्यकाल - वह राज्यपाल के प्रसादपर्यंतर्यं अपने पद पर रहता है राज्यपाल के द्वारा उसे किसी भी समय उसके पद से हटाया जा सकता है उसे हटाने के विषय मे...

पृथक्करण का सिद्धांत (Doctrine of Severability ) UPSC LL.B., BA.LL.B., LLM Notes - freshlegal | Doctrine Of Severability: A Scalpel Rather with cases;

पृथक्करण का सिद्धांत (पृथक्करण का सिद्धांत ) इस सिद्धांत का अर्थ विभाजन का सिद्धांत विवरण 13 से संबंधित है जब किसी अधिनियम का कोई भाग और असंवैधानिक होता है तब प्रश्न यह है कि क्या उस संपूर्ण अधिनियम को शून्य घोषित किया जाएगा या केवल उसके अवैध भाग को ही शून्य घोषित किया जाएगा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस सिद्धांत के पृथक्करण के सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया है यदि किसी अधिनियम का अवैध भाग उसके शेष भाग से बिना विधान मंडल के कार्य या अधिनियम के मूल संप्रदाय से अलग हो सकता है तो केवल मूल अधिकार से शून्य वाला भाग ही वैध है संपूर्ण अधिनियम को घोषित नहीं किया गया | केस ए के गोपालन बनाम मद्रास राज्य 1950    इस मामले में दंडात्मक निषेध अधिनियम 1950 की धारा 14 की धारा 14 को चुनौती दी गई थी, जिसमें किसी व्यक्ति के अपराधी की विधि के आधार पर जांच की गई थी, इसलिए सुप्रीम कोर्ट की धारा 14 को अवैध निषेध अधिनियम की धारा 14 को चुनौती दी गई थी। सुरक्षित। इस धारा को अलग कर देने से अधिनियम की प्रकृति और उसके उद्देश्य में कोई परिवर्तन नहीं होगा इसलिए धारा 14 को अवैध घोषित कर दिया ग...

संविधान के अनुसूचियां: ( schedule)|भारतीय संविधान और संवैधानिक व्याख्या |भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था-UPSC L.L.M, L.L.B, B.A.LL.B. सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए____🙏

परिचय 👇 भारतीय संविधान की अनुसूचियाँ भारतीय संविधान की अनुसूचियाँ – संपूर्ण जानकारी भारतीय संविधान में प्रारंभ में 8 अनुसूचियाँ थीं, लेकिन वर्तमान में 12 अनुसूचियाँ हैं। समय-समय पर हुए संविधान संशोधनों के माध्यम से नई अनुसूचियों को जोड़ा गया: 📌 अनुच्छेद 21 के सभी महत्वपूर्ण अधिकार और केस पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 📖 9वीं अनुसूची – प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 से जोड़ी गई। 10वीं अनुसूची – 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 से जोड़ी गई। 11वीं अनुसूची – 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 से जोड़ी गई। 12वीं अनुसूची – 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1993 से जोड़ी गई। 1. पहली अनुसूची इसमें भारतीय संघ के घटक राज्यों (28 राज्य) एवं संघशासित क्षेत्रों (8) का उल्लेख है। नोट: 69वें संविधान संशोधन के द्वारा दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) का दर्जा दिया गया। 2. दूसरी अनुसूची भारतीय राजव्यवस्था के विभिन्न पदाधिकारियों क...

भारत का महान्यायवादी(Attorney General of India)

भारत का महान्यायवादी (Attorney General  of India) परिचय -- यह लेख लखनऊ विश्वविद्यालय का छात्र दीपांकारशील प्रियदर्शी द्वारा लिखा गया है जिनमें भारत के महान्यायवादी के बारे में अनुच्छेद के साथ विस्तार पूर्वक लिखा गया है। भारत का महान्यायवादी (Attorney General of India) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 76 में भारत के महान्यायवादी के बारे में प्रावधान किया गया है महान्यायवादी देश का सर्वोच्च कानून अधिकारी होता है वह भारत सरकार का मुख्य कानून सलाहकार और उच्चतम न्यायालय में सरकार का प्रमुख वकील होता है  महान्यायवादी की नियुक्ति  महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा किया जाता है  महान्यायवादी के के पद के लिए योग्यता महान्यायवादी में पद के लिए व्यक्ति में वह सारी योग्यता होनी चाहिए जो उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए जरूरी होती है साधारण शब्दों में  1 भारत का नागरिक  हो। 2 उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का 5 वर्षों का अनुभव हो या किसी उच्च न्यायालय में वकालत का 10 वर्षों का अनुभव हो। 3 राष्ट्रपति की राय...

भारतीय संविधान की उद्देशिका अथवा प्रस्तावना

नेहरू द्वारा प्रस्तुत उद्देश्य संकल्प में जो आदर्श प्रस्तुत किया गया उन्हें संविधान की उद्देशिका में शामिल कर लिया गया संविधान के 42 वें संशोधन 1976 में द्वारा यथा संशोधित या उद्देश्य का निम्न प्रकार है     हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्र आत्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को          सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय         विचार अभिव्यक्ति विश्वास धर्म और उपासना की स्वतंत्रता          प्रतिष्ठा और अवसर की समता          प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में          व्यक्त की गरिमा और राष्ट्र की         एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता          बढ़ाने के लिए  दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर 1949 ई मिट्टी मार्ग शुक्ला सप्तमी संवत 2006 विक्रम को एक द्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। प्रस्त...

भारतीय संविधान सभा के विकास का संक्षिप्त इतिहास

                                   भाग 1 1. भारतीय संविधान के विकास का आदर्श इतिहास  🔘1757 ई. के प्लासी की लड़ाई और 1764 ई. के प्लासी की लड़ाई के बाद बंगाल पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने शासन का कब्ज़ा कर लिया, इसी शासन को अपने अनुकूल बनाए रखने के लिए मौसी ने कई ऐसे समय पर समय-समय पर जीत हासिल की अधिनियम पारित किया गया है जो भारतीय संविधान के विकास की सीढ़ियाँ बनी हैं | वे निम्न हैं___  🔘 1773 ई. का रेगुलेटिंग अधिनियम : यह अधिनियम अत्यंत संवैधानिक महत्व का है ; जैसे--- (ए) भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित करने की दिशा ब्रिटिश सरकार द्वारा उठाई गई        यह पहला कदम था. यानि कंपनी पर शासन व्यवस्था स्थापित कर नियंत्रित किया गया। (बी) इसे पहली बार कंपनी के उद्यमों और राजनीतिक उद्यमों को सिद्धांत मिला।  (सी) इसके द्वारा केंद्रीय प्रशासन की स्थापना की गई   विवरण :     1 इस अधिनियम के तहत बंगाल के गवर्नर को बंगाल के गवर्नर ज...

अच्छादन का सिद्धांत या( ग्रहण का सिद्धां | एक सरल व्याख्या हिंदी में

यह लेख लखनऊ विश्वविद्यालय   की कानून की छात्र  Dipankarshil priyadarshi ने लिखा है। यह लेख आच्छादन का सिद्धांत  (डॉक्ट्रिन ऑफ़ एक्लिप्स) के बारे में बात करता है जो एक कानूनी सिद्धांत है जिसका उपयोग मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले पूर्व-संवैधानिक कानूनों को अमान्य करने के लिए किया गया है। यह एक ऐसा सिद्धांत है जो मौलिक अधिकारों के विचारित (प्रस्तुत किया हुआ ) करने की अवधारणा को कायम रखता है।  अच्छादन का सिद्धांत या ग्रहण का सिद्धांत | एक सरल व्याख्या हिंदी में  परिचय। भारतीय संवैधानिक कानून के तहत आच्छादन का सिद्धांत एक कानूनी सिद्धांत है कोई भी मौजूदा कानून जो जो मौलिक अधिकारों के विरुद्ध में हो तो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला कानून एक आच्छादन की स्थिति में रहता है जो इसे निष्क्रिय और अप्रवर्तनीय बना देता है। इस लेख केl माध्यम से PCS.J., LL.B., LL.M., एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से भारतीय राजव्यवस्था विषय के अंतर्गत आने वाले आच्छादन का सिद्धांत (Doctrine of Eclipse in Hindi) का अध्ययन के बारे दिया गया है। व्याख्या अनुच्छेद क...