अधिकार का अस्तित्व ही उपाय पर निर्भर करता है। यदि व्यक्ति एवं समाज में मनुष्य में प्रदत्त अधिकारों के हनन हेतु कोई उपाय न हो तो वास्तव में अधिकार का हनन कहा ही नहीं जायेगा। जव इस सूत्र का संदर्भ अपकृत्य विधि के सम्बन्ध में दिया जाता है तो उस समय ऐसे अधिकारों के उपाय की ओर संकेत मिलता है जो विधि द्वारा प्रदत्त किये गये हों। यह पहले ही बताया जा चुका है कि अपकृत्य विधि के अन्तर्गत क्षतिपूर्ण दायित्वों का प्रश्न तभी पैदा होता है जब किसी व्यक्ति के विधिक अधिकारों का हनन किया जाता है।
इस प्रकार विधि द्वारा प्रदत्त अधिकारों के संरक्षण के लिये देश का कानून भी उचित उपाय प्रदान करता है। इस प्रसंग में यह स्पष्ट कर दिया जाय कि नैतिक अधिकारों के अतिक्रमण अथवा उल्लंघन के सम्बन्ध में सूत्र का विशेष महत्व है। वास्तव में यदि कहा जाय कि अपकृत्य विधि का विकास ही इस कहावत पर आधारित है तो यह अतिशयोक्ति न होगी। इस सूत्र का वास्तविक अर्थ यह है कि 'जहाँ अधिकार है वहाँ उपचार भी सुलभ होने चाहिए।' अधिकार का अस्तित्व ही उपाय पर निर्भर करता है। यदि व्यक्ति एवं समाज में मनुष्य में प्रदत्त अधिकारों के हनन हेतु कोई उपाय न हो तो वास्तव में अधिकार का हनन कहा ही नहीं जायेगा।
जव इस सूत्र का संदर्भ अपकृत्य विधि के सम्बन्ध में दिया जाता है तो उस समय ऐसे अधिकारों के उपाय की ओर संकेत मिलता है जो विधि द्वारा प्रदत्त किये गये हों। यह पहले ही बताया जा चुका है कि अपकृत्य विधि के अन्तर्गत क्षतिपूर्ण दायित्वों का प्रश्न तभी पैदा होता है जब किसी व्यक्ति के विधिक अधिकारों का हनन किया जाता है। इस प्रकार विधि द्वारा प्रदत्त अधिकारों के संरक्षण के लिये देश का कानून भी उचित उपाय प्रदान करता है। इस प्रसंग में यह स्पष्ट कर दिया जाय कि नैतिक अधिकारों के अतिक्रमण अथवा उल्लंघन के सम्बन्ध में उक्त सूत्र का कोई महत्त्व नहीं होता है। जहाँ विधिक अधिकार प्राप्त नहीं है, वहाँ विधिक क्षति भी हुई नहीं कही जा सकती और विधिक उपायों की सुरक्षा नहीं मिलती है। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम एशबी बनाम ह्वाइट के उपर्युक्त सन्दर्भित वाद में किया गया था। उक्त बाद में वादी एक निर्वाचक सूची में मतदाता था। प्रतिवादी एक निर्वाचन अधिकारी था। निर्वाचन अधिकारी ने मूल से उसके द्वारा दिये गये विधिक मतदान को पंजीकृत करने से रोक दिया किन्तु इस बात के बावजूद भी, चुनाव में अभ्यर्थी जो वादी का था, विजयी हो गया। वादी ने प्रतिवादों के विरुद्ध क्षति का वाद न्यायालय में प्रस्तुत किया, किन्तु प्रतिवादी ने न्यायालय के सम्मुख यह कथन रखा था कि वादी को उसके अनुचित कार्य से कोई हानि नहीं हुई क्योंकि चुनाव में खड़े जिस अभ्यर्थी को बादी अपना मत देना चाहता था, वह चुनाव में विजयी हुआ था। अतः वादी को प्रतिवादी के विरुद्ध मुकदमा चलाने का कोई अधिकार नहीं था, किन्तु न्यायालय ने प्रतिवादी के इस कथन को अस्वीकार करते हुए यह निर्णय दिया था कि वादी को कार्यवाही चलाने का अधिकार प्राप्त था। ज्ञातव्य है कि उक्त मुकदमे में विद्वान न्यायाधीश होल्ट ने यह व्यवस्था दी थी कि क्योंकि वादी को अपना मत देने का विधिक अधिकार प्राप्त था, अतः उसके इस अधिकार के संरक्षण के लिए उपाय भी अवश्य प्राप्त होने चाहिए। वस्तुतः उपाय के अभाव में अधिकार की कल्पना ही नहीं की जा सकती, क्योंकि अधिकार और उपाय एक-दूसरे के अनुपूरक है।
संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि 'जहाँ कहीं अधिकार है वहीं उसका उपाय है। ऐसा इस कारण है, क्योंकि जहाँ पर विधिक उपाय नहीं होता, वहाँ विधिक त्रुटि भी नहीं होती है।
नियम की सीमाएँ
(Limitations to the Rule)
'जहाँ अधिकार है वहाँ उपाय भी है' (Ubi jus ibi remedium) सिद्धान्त की कुछ मर्यादाएँ है। इस सिद्धान्त का अर्थ यह कदापि नहीं है कि प्रत्येक प्रकार के दोषों के लिए उपचार उपलब्ध
1. राजनैतिक या नैतिक दोषों में यह सिद्धान्त लागू नहीं होता है।
2. अलिखित अथवा प्रतिकरविहीन प्रतिज्ञा के भंग पर भी लागू नहीं होता है।
3. किसी पीड़ाकारक अधिनियम के विरुद्ध इसका प्रश्श्रय नहीं लिया जा सकता है।
4. इस सिद्धान्त के क्षेत्र से वे अपकृत्य भी बाहर है जिनके लिए कोई परिनियमित दण्ड
( Statutory penalty) प्राप्त है।
नूर मोहम्मद बनाम जियाउद्दीन AIR 1992 M.P 244 के बाद में एक पिता अपने पुत्र की बारात वधू पक्ष के यहाँ ले गया। बारात के साथ नाचने वाली लड़की को भी ले गया था। शादी के पश्चात् वर के पिता ने वधू के पिता से नाथने वाली लड़की के खर्चे की माँग की और धमकी दी कि यदि यह खर्च नहीं दिए गए तो विवाहित बघू को छोड़कर बारात वापस ले जायेगा।
वधू के पिता द्वारा अस्वीकार करने पर वधू को छोड़ बारात वापस ले गया। वधू के पिता ने बारात के खर्चे व प्रतिष्ठा की क्षति आदि के लिए वाद प्रस्तुत किया। परीक्षण न्यायालय ने वादी के पक्ष में निर्णय दिया तथा आज्ञप्ति पारित किया। प्रतिवादी द्वारा उच्च न्यायालय में अपील प्रस्तुत होने पर अपील अस्वीकृत की गई तथा यह व्यवस्था धारित की गयी कि वाद प्रतिवादियों के आचरण का विश्लेषण उनकी अप्रकृत्य प्रकृति को दर्शाता है।
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Law of Torts
