संचार या संप्रेषण का अर्थ एवं स्वरूप
मानव अन्तःक्रिया की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया सम्प्रेषण है। सामाजिक अन्तःक्रिया की जटिल प्रक्रियाओं का यह एक मौलिक अंश है। 'सम्प्रेषण' का अंग्रेजी रूपान्तर communication है जो लैटिन शब्द से उत्पन्न हुआ है तथा जिसका अर्थ सामान्य होता है। सम्प्रेषण में एक जीवित प्राणी दूसरे जीवित प्राणी से एक सामान्य बोध (understanding) स्थापित करता है। अतः यह कहा जा सकता है कि सम्प्रेषण में दो या दो से अधिक प्राणी या व्यक्ति सूचनाओं एवं अनुभूतियों को आपस में विनिमय करते हैं। पशु में भी सम्प्रेषण की क्षमता होती है। वे अपनी विशेष भाव-भंगिमा या बोली के माध्यम से अपनी अनुभूतियों को अपनी प्रजाति के अन्य सदस्यों तक पहुँचाते हैं। मानव सम्प्रेषण पशु सम्प्रेषण से इस अर्थ में भिन्न होता है कि मानव में सम्प्रेषण के दौरान कुछ सामान्य प्रतिक्रिया संकेतों जैसे-शब्द आदि का उपयोग करने की क्षमता होती है। इस तरह मानव में लिखित या वाचिक (oral) भाषा का उपयोग करने की क्षमता होती है। सम्प्रेषण में इनका उपयोग करके व्यक्ति अपने विचारों, चिन्तनों आदि को दूसरों तक पहुँचाता है तथा दूसरों के चिन्तनों, विचारों आदि से अवगत भी होता है। यदि हम सम्प्रेषण को परिभाषित करना चाहें, तो इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं-भाषा, संकेत या चिह्न आदि के माध्यम से अपने चिन्तन एवं विचार को दूसरों तक पहुँचाने की प्रक्रिया को सम्प्रेषण कहा जाता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति दूसरों के चिन्तन एवं विचार से अवगत भी होता है।
क्रच और उनके साथियों (1952) ने सम्प्रेषण के अर्थ को स्पष्ट करते हुए लिखा है, "किसी वस्तु के विषय में समान (Common) या सहभागी (Shared) ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रतीकों का उपयोग ही सम्प्रेषण है। यद्यपि मनुष्यों में सम्प्रेषण का महत्वपूर्ण माध्यम भाषा ही है फिर भी अन्य प्रतीकों का भी प्रयोग हो सकता है।" मैकडेविड और हरारी (1969) के अनुसार, "मनोविज्ञान की दृष्टि से सम्प्रेषण का अभिप्राय है कि व्यक्तियों के बीच विचारों और अभिव्यक्तियों का आदान-प्रदान।" जार्ज मिलर (1974) के अनुसार, "सम्प्रेषण उस समय होता है जब एक स्थान व समय की घटनाएँ दूसरे स्थान और समय की घटनाओं से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित होती हैं।" सम्प्रेषण की विभिन्न विद्वानों के द्वारा अलग-अलग परिभाषायें दी गई हैं। इनमें से कुछ प्रमुख परिभाषाएँ इस प्रकार हैं-
(i) न्यूमैन व समर के शब्दों में, "सम्प्रेषण दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बोच तथ्यों, विचारों, राय एवं भावनाओं का आदान-प्रदान है।"
(ii) कीथ डेविस के अनुसार, "सम्प्रेषण वह प्रक्रिया है जिसमें सन्देश व जानकारी को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को पहुँचाया जाता है।"
(iii) लुईस ए० एलन (Louis A. Allen) के शब्दों में, "सम्प्रेषण उन सब बातों का योग है जो एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को अपनी बात समझाने के लिए करता है। इसमें कहने, सुनने और समझने की विधिवत क्रिया निरन्तर चलती रहती है।"
(iv) फ्रेड जी० मायर के शब्दों में, "सम्प्रेषण शब्दों में, पत्रों, सूचनाओं, विचारों एवं सम्पत्तियों के आदान-प्रदान करने का साधन है।"
(v) सी०जी० ब्राउन (C.G.Brown) के शब्दों में, "सम्प्रेषण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच सूचनाओं का सम्प्रेषण है, चाहे उससे विश्वास उत्पन्न हो अथवा नहीं और पारस्परिक विनिमय हो या नहीं, लेकिन इस प्रकार दी गई सूचना प्राप्त कर्ता को समझ आ जानी चाहिए।"
(vi) एडविन ब्राउन फ्लिप्पो (Edwin Brown Flippo) के अनुसार, "सम्प्रेषण अन्य व्यक्तियों को इस तरह प्रोत्साहित करने का कार्य है, जिससे वह किसी विचार का उसी रूप में अनुवाद करे जैसा कि लिखने या बोलने द्वारा चाहा गया है।"
उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि, "मनोविज्ञान की दृष्टि से सम्प्रेषण का अभिप्राय है-दो या दो से अधिक व्यक्तियों के विचारों और अभिव्यक्तियों का प्रतीकों के द्वारा आदान-प्रदान। सम्प्रेषण उस समय होता है जब एक स्थान और समय की घटनाएँ दूसरे स्थान और समय की घटनाओं से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित होती हैं।" यद्यपि मनुष्यों में सम्प्रेषण का महत्वपूर्ण माध्यम भाषा ही है फिर भी लोग विचारों और अभिव्यक्तियों का आदान-प्रदान करते समय भाषा के अन्य प्रतीकों का भी प्रयोग करते हैं।
लिण्डग्रेन (H. C. Lindgren, 1974) ने सम्प्रेषण के महत्व को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि "सामाजिक प्रत्यक्षीकरण सम्प्रेषण के बिना नहीं हो सकता है। व्यक्ति को एक-दूसरे का प्रत्यक्षीकरण करने के लिए सूचनाओं को ऐच्छिक या अनैच्छिक रूप से प्रसारित करना ही होता है। सम्प्रेषण-व्यक्तियों के बीच अर्थों का आदान-प्रदान है, जो मुख्यतः भाषा द्वारा घटित होता है। यह तभी सम्भव है जब व्यक्तियों के संज्ञान, आवश्यकताएँ और अभिवृत्तियाँ समान हो।" सम्प्रेषण व्यक्तियों के आमने-सामने के वार्तालाप में ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि इसका महत्व विद्यालय के शिक्षण में, सामाजिक अन्तः क्रियाओं में और वैज्ञानिक शोध कार्यों, आदि में भी है। सम्प्रेषण की अनुपस्थिति में इन सभी चीजों में स्थिरता आ जाएगी। सम्प्रेषण के माध्यम से कोई व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और आवश्यकता, आदि को दूसरों तक पहुँचाता है और इसके द्वारा अनेक लोगों की सूचनाओं को भी ग्रहण किया जाता है। सम्प्रेषण की अनुपस्थिति में किसी भी आवश्यकता की सन्तुष्टि सम्भव नहीं है। समाज मनोविज्ञान के क्षेत्र में सम्प्रेषण के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा जा सकता है कि सम्प्रेषण समूह के निर्माण में सहायक है। यह सामाजिक अन्तः क्रियाओं में सहायक है। सम्प्रेषण के बिना समूहों का अस्तित्व नहीं रह सकता है।
सम्प्रेषण की विशषतायें
(Characteristics of Communication)
सम्प्रेषण की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-
(1) सम्प्रेषण विचारों का आदान-प्रदान (Exchange of ideas) है अत: दो तरफा (Two way traffic) है। सन्देश देने वाला अर्थात् प्रेषक तथा सन्देश प्राप्त करने वाला दोनों के लिए आवश्यक है।
(2) सम्प्रेषण के द्वारा कर्मचारियों का विकास किया जाता है चूँकि उन्हें उपक्रम से सम्बन्धित विभिन्न जानकारियाँ दी जाती हैं जिससे उनके ज्ञान में वृद्धि होती है।
(3) सम्प्रेषण उपक्रम के विभिन्न विभागों में समन्वय (Co-ordination) स्थापित करता है। कर्मचारियों के साथ सीधा सम्पर्क स्थापित करना इसका ध्येय होता है। इससे उनके मनोबल में वृद्धि होती है।
(4) सम्प्रेषण प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष हो सकता है। इसमें प्रयुक्त शब्द अलग-अलग अर्थ रखते हैं। (Words used in communication carry different meanings.)I (5) सम्प्रेषण सूचना से कुछ अधिक है क्योंकि सूचना के अलावा व्यावहारिक
विनिमय को भी इसमें सम्मिलित किया जाता है। यह निर्देशन का एक महत्वपूर्ण अंग है।
(6) सम्प्रेषण का लक्ष्य आदेशों एवं निर्देशों को उन सभी व्यक्तियों तक पहुँचाना है जिनसे वे सम्बन्धित हैं।
(7) सम्प्रेषण व्यक्तिगत समझ और मनोदशा पर निर्भर करता है (Communication depends on individuals perception and emotions.)। इसका मुख्य उद्देश्य पूर्व निर्धारित नीतियों एवं निर्देशों को क्रियान्वित करना होता है। यह विचारों को कायर्यों में परिवर्तित करता है।
(8) सम्प्रेषण शब्दों में भी किया जा सकता है और संकेतों में भी (words as well as symbols)। इसका उद्देश्य आपसी समझ (Mutual understanding) को बढ़ाना है।
(9) सम्प्रेषण लिखित (Written), मौखिक (Verbal) एवं सांकेतिक (Non-verbal) हो सकता है।
(10) बिना संदेश के सम्प्रेषण नहीं हो सकता यह केवल एक बार का संवाद नहीं होता वरन् निरन्तर चलता रहता (Continuous process) है।
इस प्रकार सम्प्रेषण दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य सन्देशों, विचारों, भावनाओं, सम्मतियों, तथ्यों तथा तर्कों का आदान-प्रदान है, जिससे व्यावसायिक उद्देश्यों एवं व्यवहार में एकरूपता आती है।
संप्रेषण की प्रकृति (Nature of Communication)
सम्प्रेषण की प्रकृति निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट की जा सकती है-
(1) सम्प्रेषण एक सतत प्रक्रिया-सम्प्रेषण एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें दो पक्ष होते हैं- एक संदेश प्रेषित करता है और दूसरा पक्ष संदेश प्राप्त करने पर अपनी प्रतिक्रिया पुनःसंदेश-प्रेषक को सूचित करता है। इस प्रकार यह क्रम निरन्तर चलता रहता है।
(2) सम्प्रेषण प्रबन्धकीय निर्देशन का एक मुख्य अंग-बिना निर्देशन के कोई भी प्रबन्धकीय कार्य सम्पन्न नहीं किया जा सकता। निर्देशन कार्य स्वयं अभिप्रेरणा एवं कुशल नेतृत्व की भाँति सम्प्रेषण के बिना प्रभावपूर्ण ढंग से सम्पन्न नहीं किया जा सकता। अतः सम्प्रेषण निर्देशन कार्य का एक प्रमुख अंग है, जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।
(3) सम्प्रेषण की सफलता उससे सम्बन्धित पक्षों पर निर्भर वास्तव में सम्प्रेषण का आशय दो पक्षों द्वारा एक बात को एक ही अर्थ में समझने से है। अतएव इसके लिए आवश्यक है कि संदेश-प्रेषक स्वयं अपने विचार के बारे में स्पष्ट हो और उसे दूसरे पक्ष के सम्मुख इस कुशलता से प्रस्तुत करे कि वह उसको सरलता व स्पष्टतापूर्वक उसी अर्थ में समझ सके। सम्प्रेषण की सफलता संदेश-प्रापक पर भी बहुत कुछ निर्भर करती है। संदेश कितना भी सरल एवं स्पष्ट क्यों न हो, यदि संदेश प्रापक उसको बिना किसी पक्षपात, अज्ञानता एवं द्वेषभाव के सही अर्थ में समझने का प्रयत्न नहीं करता है, तो वह व्यर्थ हो जाता है।
(4) सम्प्रेषण एक व्यापक प्रक्रिया-सम्प्रेषण में केवल सूचना मात्र ही प्रेषित नहीं होती, अपितु इसमें एक व्यक्ति अपने विचारों से अन्य पक्ष को अवगत कराता है, उनके विचार प्राप्त करता है, परामर्श करता है, अपने विचारों में संशोधन एवं परिवर्तन करता है। इसमें अधिकारी द्वारा अपने अधीनस्थों को आदेश व निर्देश प्रदान किए जाते हैं और कर्मचारी भी अपने सुझाव व कठिनाइयाँ अधिकारियों के सम्मुख प्रस्तुत कर सकते हैं। इस प्रकार सम्प्रेषण एक व्यापक प्रक्रिया है।(5) सम्प्रेषण एक प्रशासकीय कार्य-जब सम्प्रेषण का प्रयोग व्यावसायिक क्षेत्र में किया जाता है, तब सामान्यतः इसकी प्रकृति प्रशासकीय हो जाती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि एक व्यावसायिक संगठन में, जहाँ बड़ी संख्या में कर्मचारी कार्य-संलग्न होते हैं तथा कार्य-विभाजन की दृष्टि से अनेक विभाग होते हैं, उनमें सम्प्रेषण, कर्मचारियों के अधिकारों व उत्तरदायित्वों के निर्धारण हेतु, कार्य-सम्बन्धी आदेश व निर्देश देने हेतु, कार्य व कर्मचारियों पर नियंत्रण स्थापित करने आदि के लिए आवश्यक होता है। चार्ल्स ई० रेडफील्ड के अनुसार, "प्रशासकीय सम्प्रेषण केवल सूचना के विनियम से ही सम्बन्धित नहीं है, अपितु प्रशासन से भी सम्बन्धित है। एक संगठन की सम्प्रेषण समस्याओं तथा कर्मचारियों की कार्य-दशाओं, वेतन, पर्यवेक्षण और कार्य पद्धतियों आदि की समस्याओं में कोई अन्तर नहीं है।"
(6) सम्प्रेषण, कार्यों के निष्पादन की आधारिशला-सम्प्रेषण द्वारा ही व्यक्तियों को कार्य करने के लिये प्रेरित किया जाता है। इसके द्वारा ही कर्मचारियों को यह ज्ञात होता है कि उन्हें क्या, कब, कहाँ और कौन-सा कार्य करना है। अपने कार्यों की निष्पत्ति का मूल्यांकन कराकर उनमें सुधार लाने की प्रक्रिया के रूप में सम्प्रेषण की महत्वपूर्ण भूमिका है।
सम्प्रेषण की प्रक्रिया
(Process of Communication)
कीथ डेविस (Keith Davis) के अनुसार सम्प्रेषण की प्रक्रिया में 6 अवस्थाएँ शामिल हैं। इन अवस्थाओं का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है-
(1) विचार की सृष्टि (Ideation)- सम्प्रेषण की प्रक्रिया का प्रारम्भ किसी ऐसे विचार की उत्पत्ति से होता है जिसे हम दूसरे व्यक्ति को भेजने के इच्छुक हों। इस- सम्बन्ध में यह महत्वपूर्ण है कि अपने विचार को सही ढंग से प्रस्तुत करने के लिए सर्वप्रथम सन्देश प्रेषक को उसी समय ही स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए तथा इसकी स्पष्ट संक्षिप्त रचना कर लेनी चाहिए।
(2) सन्देशबद्धता (Encoding)- यह निर्णय हो जाने के बाद कि दूसरे व्यक्ति को क्या संदेश भेजा जाना है, उस संदेश को निश्चित चिन्हों में बदलना पड़ता है। संदेश मौखिक, लिखित या विभिन्न संकेतों के माध्यम से दिया जा सकता है। संकेत कैसे दिए जाएँगे, हमें अपने संदेश को उचित संकेतों या चिन्हों में परिवर्तित कर लेना चाहिए। अनेक संदेश गोपनीय होते हैं। इन सन्देशों को प्रायः सांकेतिक भाषा के माध्यम से देखा जा सकता है।
(3) सन्देश का प्रेषण (Transmission of Message)- जब सन्देश को लिपिबद्ध कर सांकेतिक भाषा में परिवर्तित कर लिया जाए तो निश्चित व्यक्ति को सन्देश भेजने की व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके लिए उचित माध्यम का उपयोग करना पड़ता है। मौखिक तथा लिखित सन्देश भेजने के अनेक माध्यम हैं, जैसे, टेलीफोन, पत्र, परिपत्र, सन्देशवाहक के माध्यम से सन्देश भेजना आदि। सन्देश भेजते समय हमें अपनी आवश्यकता के अनुसार उचित माध्यम तथा समय का चयन कर लेना चाहिए।
(4) सन्देश प्राप्त करना (Receiving Message)- सम्प्रेषण की प्रक्रिया में यह व्यवस्था सन्देश प्राप्त करने वाले व्यक्ति से सम्बन्ध रखती है इसके अन्तर्गत संदेश प्राप्त करने वाले व्यक्ति के द्वारा सन्देश को ध्यान से सुन या प्राप्त कर लेने के बाद पढ़ना
सम्मिलित किया जाता है।
(5) सन्देशवाचन (Decoding)- सन्देशवाचन के अन्तर्गत सन्देश का प्राप्तकर्ता उसको पढ़कर समझने का प्रयास करता है। यदि इस सम्बन्ध में कोई सन्देह या अस्पष्टता हो तो तुरन्त ही सन्देश प्रेषक से उसे दूर करा लेना चाहिए, ताकि बाद में किसी प्रकार की समस्या न आए।
(6) कार्यवाही (Action)-सम्प्रेषण की प्रक्रिया में दूसरे व्यक्ति तक सन्देश को पहुँचाना ही शामिल नहीं किया जाता, बल्कि उसे उस समय पूरा हुआ माना जाता है जब सन्देश प्राप्तकर्ता उस सन्देश पर उचित कार्यवाही कर दे। इस सन्दर्भ में यह जानने के लिए कि सन्देश प्राप्तकर्ता ने सन्देश का पालन किया या नहीं, इस बात की व्यवस्था की जाती है कि वापसी जानकारी प्राप्त हो जाए। यदि सन्देश का पालन सही प्रकार से नहीं होने की सूचना मिले तो सन्देश प्रेषक को उचित सुधारात्मक कार्यवाही करनी पड़ती है।
वस्तुतः सम्प्रेषण प्रक्रिया के निम्न तत्वों का उल्लेख किया जा सकता है-
(1) प्रेषक (Sender) सम्प्रेषण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है जब प्रेषक को सम्प्रेषण की आवश्यकता अनुभव होती है तथा उसके मस्तिष्क में विचार उठता है। प्रेषक (sender or transmitter) सन्देश का स्रोत होता है तथा वह किसी न किसी उद्देश्य के लिए सूचना या सन्देश भेजना चाहता है। वह एक वक्ता हो सकता है या एक लेखक या एक अभिनेता (a speaker/writer/actor) तथा उसके मस्तिष्क में इस बात की स्पष्ट छवि होती है जो भी वह प्रेषित करना चाहता है। उसके दिमाग में अनेक विचार जन्म ले सकते है तथा उसको उन्हें प्राप्तकर्ता को भेजने से पूर्व उनकी स्पष्ट पहचान, विश्लेषण तथा क्रमबद्ध तौर पर व्यवस्था करनी पड़ेगी अन्यथा प्राप्तकर्ता अनुभव कर सकता है कि प्रेषक अपने विचारों में एकदम स्पष्ट नहीं है। अतः उसके विचार एकदम सटीक, ठोस तथा नपे-तुले होने चाहिये। प्रेषक को अपने विचारों को एक सन्देश (Message) के रूप में एन्कोड (encode) कर लेना चाहिये।
(2) सन्देश (Message)- जो भी प्रेषक द्वारा प्रेषित किया जा रहा है वह सन्देश कहलाता है। सन्देश मौखिक हो सकता है अथवा लिखित, यही नहीं यह गैर-शाब्दिक भी हो सकता है जैसे चुप रहना, हाथ हिलाना, इशारा करना, गर्दन घुमाना, अन्य किसी तरीके से शरीर की भाषा (body language) का उपयोग करना। वस्तुतः सन्देश सम्प्रेषण का मेरुदण्ड होता है। प्रेषक अपने विचारों तथा तथ्यों को शब्दों, संकेत चिन्हों, चित्रों या हावभावों का जामा पहनाता है जो दूसरा व्यक्ति समझ सके। सम्प्रेषण की प्रक्रिया का यह भाग encoding कहलाता है। इसमें उपयुक्त माध्यम (media) के चयन का भी समावेश होता है ताकि विचारों को सन्देश के उद्देश्य तथा प्राप्तकर्ता की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर सावधानीपूर्वक शब्दों तथा संकेतों का चयन किया जा सके। शब्द तथा संकेत चिन्ह सम्प्रेषण, प्राप्ति तथा समझ के लिए उपयुक्त होने चाहिये।
(3) सम्प्रेषण श्रृंखला (Communication Channel) - श्रृंखला प्रेषक को प्राप्तकर्ता से जोड़ती है। सम्प्रेषण श्रृंखला के बिना कोई भी सम्प्रेषण सम्भव ही नहीं हो पायेगा। माध्यम (medium) श्रृंखला से भिन्न होता है। उदाहरण के लिए एक पत्र माध्यम है जबकि कोरीयर सेवा या डाक सेवा एक श्रृंखला है। व्याख्यान या भाषण एक माध्यम है लेकिन रेडियो, लाऊडस्पीकर, मात्र श्रृंखला है। मौखिक या दृश्य सम्प्रेषण में सन्देश का तुरन्त ही संवहन हो जाता है। लेकिन लिखित सन्देश में सन्देश के प्रेषण तथा प्राप्ति के बीच समय अन्तराल होता है।
(4) प्राप्तकर्ता (Receiver)- वह व्यक्ति या समूह जिसको सन्देश भेजा जाता है प्राप्तकर्ता कहलाता है। प्राप्तकर्ता सन्देश के गन्तव्य की अभिव्यक्ति करता है। वह एक श्रोता हो सकता है या एक दर्शक या पाठक (a listener/viewer/reader)। ठीक प्रेषक की तरह उसके मस्तिष्क में भी प्रेषक की तथा स्वयं अपनी छवि बन जाती है। वह सन्देश में प्रयुक्त शब्दों या सकैतों को विचारों में बदल लेता है तथा उसका अर्थ पाने के लिए उसका विश्लेषण करता है। यही प्रक्रिया decoding कहलाती है तथा यह encoding के एकदम विपरीत क्रिया है। यदि प्राप्तकर्ता प्रयुक्त कोडों से परिचित होता है तथा उसका नजरिया व्यवस्थित होता है तो वह कमोबेश वही अर्थ निकाल लेगा जो प्रेषक ने सोचा था। सन्देश प्राप्तकर्ता के मस्तिष्क में सही-सही उद्धृत होना चाहिये।
(5) फीडबैक (Feedback)- अर्थ निकालने के बाद प्राप्तकर्त्ता सन्देश के प्रति प्रतिक्रिया करता है या प्रत्युत्तर देता है। वह प्रेषक को अपना उत्तर भेजता है। सम्प्रेषण का उल्टा प्रवाह (return flow) ही फीडबैक कहलाता है। सम्प्रेषण की प्रक्रिया अधूरी रह जाती है जब तक प्रेषक को फीडबैक नहीं मिल जाता। यदि फीडबैक सन्देश के तारतम्य में होता है तो सम्प्रेषण को प्रभावी माना जाता है।
फीडबैक सम्प्रेषण का आधारभूत तत्व है क्योकि सम्प्रेषण की प्रभावोत्पादकता जानने का यही एकमात्र तरीका है। फीडबैक सम्प्रेषण के परिणाम के बारे में जानकारी का संकेत देता है। जब प्राप्तकर्ता सन्देश का प्रत्युत्तर देता है तब यह शुरु होता है और जब यह प्रत्युत्तर प्रेषक के हाथों में पहुँचता है तब यह समाप्त होता है। फीडबैक प्रेषक को यह जानने में समर्थ बनाता है कि क्या उसके सन्देश को भली प्रकार समझ लिया गया है तथा क्या उसने प्राप्तकर्ता के मस्तिष्क तथा व्यवहार पर अपेक्षित प्रभाव डाला है। फीडबैक का व्यवस्थित उपयोग भावी सन्देशों को सुधारने में सहायता करता है।
फीडबैक प्रत्येक परिस्थिति में भिन्न होता है। आमने-सामने के सम्प्रेषण में तुरन्त फीडबैक मिल जाता है तथा यही आदर्श स्थिति मानी जाती है। प्रेषक प्राप्तकर्ता के चेहरे को देखकर ही अपने सन्देश के प्रभाव का जायजा ले सकता है। वह प्रश्न भी पूछ सकता है अथवा स्पष्टीकरण माँग सकता है यदि वह समझता है कि प्राप्तकर्ता ने संदेश को शायद पूरी तरह से नहीं समझा है। आमने सामने के वार्तालाप में, फीडबैक तुरन्त हो प्रेषक को भी प्रभावित कर सकता है। श्रोतागण तालियाँ बजाकर वक्ता के मनोबल को बढ़ा सकते है या उसकी हूटिंग करके उसको बैठने के लिए विवश कर सकते हैं। इस प्रकार से फीडबैक के माध्यम से श्रोता वक्ता पर नियन्त्रण लागू कर सकते हैं। उल्लेखनीय है कि सभी परिस्थितियों में फीडबैक स्वतः ही उपलब्ध नहीं हो जाता। बहुधा अधीनस्थ बॉस से वही कहते हैं जो वह सुनना चाहता है, न कि जो वे महसूस करते हैं। ऐसे मामलों में, पदस्थिति फीडबैक के मार्ग में बाधा बन जाती है। अधीनस्थ 'भयवश या लज्जावश हो सकता है प्रत्युत्तर ही न दें। ऐसी परिस्थितियों में, फीडबैक प्राप्त करने के लिए सोचे समझे प्रयास जरूरी हो जाते हैं। बॉस को हताश नहीं हो जाना चाहिये तथा फीडबैक के लिए पर्याप्त समय की व्यवस्था करनी चाहिये। उसको प्रश्न आमंत्रित करने चाहिये तथा उनको उत्तर देने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। उसको सावधानीपूर्वक तथा गम्भीरता के साथ सुनने की योग्यता विकसित करनी चाहिये। उसको गैर-शाब्दिक फीडबैक के प्रति भी सतर्क रहना चाहिये जैसे प्राप्तकर्ता के चेहरे के हावभाव अथवा संकेतचिन्ह। फीडबैक पाने का एक अन्य तरीका है प्राप्तकर्ता से प्रश्न पूछना कि क्या उसने सन्देश को समझ लिया है। फीडबैक पाने का ऐसा सविचार प्रयास लम्बे तथा जटिल सन्देशों के लिए तो और अधिक जरूरी हो जाता है। कभी-कभी फीडबैक को अफवाहों या मौखिक सम्प्रेषण से भी जुटा लिया जाता है।
सम्प्रेषण की विधियाँ
(Various methods of Communication)
सम्प्रेषण की विभिन्न विधियों का वर्गीकरण निम्न आधारों पर किया जा सकता है-
(1) अभिव्यक्ति के आधार पर
(a) मौखिक सम्प्रेषण, (b) लिखित सम्प्रेषण।
(II) संगठन संरचना
(a) औपचारिक सम्प्रेषण, (b) अनौपचारिक सम्प्रेषण।
(III) दिशा के आधार पर
(a) नीचे की ओर सम्प्रेषण, (b) ऊपर की सम्प्रेषण, (c) समतल सम्प्रेषण।
(1) अभिव्यक्ति के आधार पर वर्गीकरण
(Classification on the basis of Expression)
(a) मौखिक सम्प्रेषण
(Verbal Communication)
दो व्यक्तियों के मध्य प्रत्यक्ष वार्तालाप के द्वारा सम्प्रेषण मौखिक सम्प्रेषण होता है। मौखिक सम्प्रेषण में दोनों पक्ष अर्थात् प्रेषक व प्रेषणी अपने-अपने विचारों का विनिमय मौखिक शब्दों द्वारा करते हैं या आमने-सामने वार्तालाप के द्वारा या या किसी मशीन या बिजली से चलने वाले यन्त्र की सहायता से, जैसे टेलीफोन इत्यादि। मौखिक सम्प्रेषण प्रायः तभी सम्भव होता है जब प्रत्यक्ष सम्पर्क हो सके तथा भेजा जाने वाला सन्देश स्थायी प्रकृति का न हो।
मौखिक सम्प्रेषण के साधन (Means of Verbal Communication) मौखिक सम्प्रेषण के निम्न साधन हो सकते हैं-
(1) व्यक्तिगत वार्तालाप-आमने-सामने बैठकर आपस में बातचीत करना, सम्प्रेषण का सबसे सरल तरीका है। प्रबन्धक संस्था में छोटे-छोटे दैनिक तथा अति आवश्यक आदेश व निर्देश सीधी बातचीत के द्वारा ही देते हैं।
(11) टेलीफोन टेलीफोन आधुनिक व्यावसायिक संस्थाओं में सबसे अधिक प्रचलित एवं लोकप्रिय साधन माना जाता है और यह एक ही विभाग में अथवा दूसरे विभागों में सम्पर्क स्थापित करने के लिए भी अच्छा साधन माना जाता है।
(iii) प्रत्यक्ष सामूहिक वार्तालाप-जब एक से अधिक व्यक्तियों को कोई सन्देश देना हो या उनसे लेना हो तो इस माध्यम को अपना सकते हैं। जब कभी प्रबन्धक अपने सहयोगियों के साथ किसी विषय पर सामूहिक विचार-विनिमय करना चाहते हैं तो वे उनकी एक बैठक बुला लेते हैं। यह बैठक एक विचार गोष्ठी का रूप भी ग्रहण कर सकती है और एक सार्वजनिक सभा का रूप भी।
(iv) रेडियो (Radio) - रेडियो के माध्यम से भी अनेक सूचनाएँ श्रोताओं को प्रदान की जा सकती हैं। आकाशवाणी का व्यापारिक विभाग विज्ञापन प्रसारण का एक अत्यन्त उपयोगी साधन है।
(v) दूरदर्शन (Television)- इसका प्रयोग विज्ञापन, जन-सम्पर्क, शिक्षा एवं निर्देशन देने हेतु किया जाता है। यहाँ सन्देश के साथ वार्ताकर्ता के दर्शन भी सभी को आसानी से सुलभ हो जाते हैं।
(vi) अन्य साधन (Other Means)- मौखिक सम्प्रेषण के अन्य साधनों में निम्न उल्लेखनीय हैं-सामाजिक गोष्ठियों का आयोजन, सिनेमा स्लाइड्स द्वारा सूचनाओं का प्रसारण, सेविवर्गीय विभागों एवं श्रम-संघ कार्यालयों की बैठकें आदि।
मौखिक सम्प्रेषण के लाभ-
(1) सन्देश लेखन में समय, कागज तथा स्थायी आदि पर व्यय नहीं करना पड़ता है। सन्देश तुरन्त शब्दों के मौखिक उच्चारण द्वारा प्रेषित कर दिया जाता है।
(2) मौखिक रूप में दिया हुआ सन्देश श्रोता पर तुरन्त प्रभाव डालता है। शब्दों के अतिरिक्त शारीरिक अंगों के परिचालन द्वारा सन्देश को सुगमता से समझने योग्य एवं अधिक प्रभावोत्पादक बनाया जा सकता है।
(3) मौखिक सम्प्रेषण में भावाभिव्यक्ति अधिक प्रभावोत्पादक और सुगमता से समझने योग्य होती है यदि कोई बात स्पष्ट न हो तो अस्पष्टता तुरन्त दूर की जा सकती है।
(4) जब कोई सन्देश प्रत्यक्ष रूप से प्रेषित किया जा रहा हो तो प्रेषक प्रेषित व्यक्ति पर सन्देश के प्रभाव का साथ ही साथ अनुमान भी लगा सकता है। यदि इच्छित प्रभाव नहीं हुआ हो अथवा पर्याप्त रूप में नहीं हुआ हो तो उसी समय पुनः प्रयत्न किया जा सकता है और सन्देश को प्रभावी बनाया जा सकता है।
(5) मौखिक सम्प्रेषण द्वारा सन्देश तत्पर गति से प्रसारित किया जा सकता है और इसके अनुसार तुरन्त क्रियान्वयन प्रारम्भ हो सकता है।
मौखिक सम्प्रेषण के दोष-
(1) मौखिक सम्प्रेषण में सन्देश देने वाले व्यक्ति और सन्देश पाने वाले व्यक्ति का प्रत्यक्ष सम्पर्क होना आवश्यक है। लेकिन व्यापारिक कार्यालय में यह सदैव सम्भव नहीं हो सकता है कि सन्देश पाने वाला व्यक्ति सरलता से उपलब्ध हो सके।
(2) बड़े मौखिक सन्देश को समझने में समय लगता है और इसका बार-बार स्पष्टीकरण भी आवश्यक होता है जिसमें अधिक समय व्यर्थ होता है।
(3) जब सन्देश प्रेषण करने वाले व्यक्ति और सन्देश प्राप्तकर्ता के मध्य पर्याप्त दूरी होती है और सन्देश का प्रेषण टेलीफोन पर वार्तालाप द्वारा किया जाता है तो टेलीफोन करने पर अधिक व्यय हो जाता है।
(4) मौखिक सम्प्रेषण की सबसे बड़ी कमी यह है कि सम्प्रेषण का कोई लिखित प्रमाण नहीं रहता। सूचना का प्राप्तकर्ता यदि बाद में अपनी स्थिति से विमुख हो जाए तो उसके विरुद्ध कोई लिखित प्रमाण न होने से वैधानिक अथवा अन्य किसी प्रकार की कार्यवाही करने में कठिनाई उत्पन्न हो जाएगी।
(5) मौखिक सन्देश का स्थायित्व नहीं होता। यदि भविष्य में आदेश में परिवर्तन को आवश्यकता पड़े या मूल आदेश के विषय में कोई सन्देह उत्पन्न हो जाए तो सन्दर्भ के लिए मूल आदेश के मौखिक होने के कारण कुछ भी उपलब्ध नहीं हो सकेगा।
(b) लिखित सम्प्रेषण
(Written Communication)
लिखित सम्प्रेषण के अन्तर्गत प्रेषक सन्देश प्राप्तकर्ता को लिखित में सन्देश भेजता है। जब सूचनाओं और विचारों का आदान-प्रदान केवल दो व्यक्तियों के बीच लिखकर किया जाए तो इसे व्यक्तिगत लिखित सम्प्रेषण कहते हैं। आजकल अधिकांश व्यावसायिक संस्थाओं में कर्मचारियों की शिकायतों और सुझावों को जानने के लिए निश्चित स्थानो पर शिकायत पेटिका (complaint box) तथा सुझाव पेटिका (suggestions box) रखो जाती है। सामूहिक लिखित सम्प्रेषण का अर्थ है, संगठन में काम करने वाले सदस्यों को सामूहिक रूप से सार्वजनिक सूचना देना। इसके अनेक साधन है जैसे बुलेटिन तथा गृह-पत्रिकाएँ, कर्मचारी निर्देशिका व नियमावली इत्यादि।
लिखित सम्प्रेषण के साधन-
(अ) बुलेटिन व गृह-पत्रिकायें-अधिकतर बड़ी-बड़ी व्यावसायिक संस्थाओं में कई प्रकार की पाक्षिक, मासिक या त्रैमासिक पत्रिकाओं, बुलेटिनों अथवा गृह पत्रिकाओं का नियमित प्रकाशन किया जाता है। इन पत्रिकाओं में कम्पनी, कर्मचारी तथा काम से सम्बन्धित अनेक लेख लिखे जाते हैं और साथ ही कर्मचारियों के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मनोरंजन की सामग्री भी दी जाती है।
(ब) कर्मचारी निर्देशिका व नियमावली-कर्मचारियों की हैण्डबुक्स, डायरियाँ या मैनुअल्स प्रायः संस्था की श्रम-नीति प्रस्तुत करती है। उनमें निम्न बातों की चर्चा होती है-मजदूरी की दरें, कार्यशील घण्टे, पदोन्नति व हस्तान्तरण सम्बन्धी नीति, भेदभाव के विरुद्ध संरक्षण, छुट्टियाँ, बीमारी का अवकाश, अवकाश-ग्रहण सम्बन्धी नियम, वर्कशाप के नियम, आदि।
(स) सूचना पट्ट-प्रायः सभी बड़ी-बड़ी संस्थाओं में कर्मचारियों को तत्काल आवश्यक सार्वजनिक सूचना देने के लिए केन्द्रीय स्थानों पर कुछ सूचना-पट्ट भी लगाए जाते हैं।
(द) गश्ती पत्र या परिपत्र-परिपत्रों में प्रशासन से सम्बन्धित नवीनतम निर्णयों तथा योजनाओं की जानकारी दी जाती है।
(य) रिपोर्ट-किसी भी संस्था के कारोबार को सही ढंग से चलाने के लिए प्रबन्धकों को तरह-तरह की सूचनाओं की आवश्यकता पड़ती है। जैसे दैनिक या साप्ताहिक उत्पादन, बिक्री, स्टॉक, बैंक शेष आदि के विवरण तैयार कराना, जिन्हें नियमित रिपोर्ट कहते हैं।
लिखित सम्प्रेषण के लाभ-
(1) यदि सन्देश का भेजने वाला तथा सन्देश का प्रापक भिन्न-भिन्न नगरों में
रहते हों और सन्देश लिखित रूप से भिजवाया जाये तो साधारण व्यय से ही
यह कार्य सम्पन्न हो जाएगा।
(2) लिखित संदेश भेजते समय प्रेषक को, सूचित व्यक्ति के, अपने समक्ष उपलब्ध होने की आवश्यकता नहीं।
(3) जो सन्देश लिपिबद्ध कर लिया जाता है, उसमें स्पष्टता आ जाती है, जिससे सन्देश में अधिक प्रभावोत्पादकता उत्पन्न हो जाती है।
(4) सन्देश के लिपिबद्ध होने के कारण यह स्थायी रूप ग्रहण कर लेता है और आवश्यकता पड़ने पर भविष्य में इसे सन्दर्भ के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है और इसके आधार पर किसी विवाद का निर्णय भी किया जा सकता है।
लिखित सम्प्रेषण के दोष-
(1) जो सन्देश छोटा हो तथा प्रत्यक्ष रूप में दूसरे पक्ष को प्रेषित किया जा सकता हो यदि ऐसे सन्देश को लिखकर भेजा जाएगा तो उससे श्रम, समय एवं धन का अपव्यय ही होगा।
(2) यदि किसी सन्देश में भूल से कोई बात लिखने से रह जाए तो फिर एक छोटी-सी बात को सूचित करने के लिए सन्देश लेखन तथा सम्प्रेषण की पूरी प्रक्रिया की पुनरावृत्ति करनी पड़ेगी।
(3) एक वृहत स्तरीय व्यावसायिक संस्था में सन्देश सम्प्रेषण के लिए लेखक, टंकणकर्ता तथा अन्य कर्मचारियों से गुजर कर पहुँचता है। इससे सन्देश की गोपनीयता समाप्त हो जाती है।
(4) जब सन्देश लिखित रूप में प्रेषित किया जाना हो तो इसका आलेख तैयार करने, टाइप कराने, अधिकारी के हस्ताक्षर कराने तथा प्रेषित करने में अत्यधिक समय लग जाता है जिससे अनावश्यक रूप से विलय होता है।
(5) कभी-कभी लिखित संवाद संवाददाता की भावनाओं को प्रकट करने में असफल रहता है।
(6) अशिक्षित व्यक्तियों के लिए लिखित सम्प्रेषण कोई अर्थ नहीं रखता, क्योंकि उनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर होता है। ऐसे लोगों को तो आमने-सामने समझना ही अधिक उपयुक्त होता है।
(II) संगठनात्मक संरचना के आधार पर वर्गीकरण
(Classification on the basis of Organisation Structure)
संगठनात्मक संरचना के आधार पर सम्प्रेषण की विधियों को निम्न दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-
(a) औपचारिक सम्प्रेषण
(Formal Communication)
औपचारिक सम्प्रेषण पद्धति का प्रयोग ऐसे उपक्रम में किया जाता है जिसमें संरचनात्मक सम्बन्ध औपचारिक होते हैं अर्थात् अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक, सौंपनिक श्रृंखला (Scalar Chain) होती है। इस प्रकार की विधि में लिखित रूप से सम्प्रेषण किया जाता है। किसी भी आदेश को उच्च-स्तर से निम्न स्तर तक पहुंचाने में आदेश विभिन्न व्यक्तियों के माध्यम से होकर जाते हैं। इसमें सर्वप्रथम उच्चाधिकारी अपने अधीनस्थ अधिकारी को सूचना सम्प्रेषित करेगा। उसके बाद वह व्यक्ति पर्यवेक्षक को तथा पर्यवेक्षक अपने कर्मचारियों तक आदेश पहुँचाते हैं। इसी प्रकार सुझाव देते समय नीचे से ऊपर की ओर सम्प्रेषण पथ का अनुसरण किया जाता है।
औपचारिक सम्प्रेषण के लाभ-
(1) सम्प्रेषण की इस पद्धति में आदेश की एकता को कायम रखा जा सकता है और भिन्न आदेशों व निदेशों में तालमेल बैठाया जा सकता है।
(2) औपचारिक सम्प्रेषण निश्चित भागों का अनुसरण करता है और अपने लक्ष्य को निश्चित रूप से प्राप्त करता है। इसकी प्रतिक्रिया का पहले से और सही अनुमान लगाया जा सकता है।
(3) अपने विभाग के कर्मचारियों के काम के लिए विभागीय अधिकारी ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। इससे अधिकारी की पदस्थिति बनी रहती है और वह अपने सहायकों पर पूरा नियन्त्रण रख सकता है।
(4) इस सम्प्रेषण की दिशा, प्रकृति तथा गति पर संस्था के प्रबन्धकों का पूरा-पूरा नियन्त्रण रहता है।
औपचारिक सम्प्रेषण के दोष-
(1) औपचारिक सम्प्रेषण में सूचनाएँ इतने अधिक स्तरों से होकर गुजरती है, कि सही अधिकारी तक पहुँचने में, न चाहते हुए भी, आवश्यकता से अधिक देरी लग जाती है।
(2) संगठन के प्रत्येक स्तर पर आगे भेजी जाने वाली सूचनाओं की संख्या इतनी बढ़ती जाती है कि प्रबन्धकों को इनकी छंटनी करनी पड़ती है। फलस्वरूप कई महत्वपूर्ण सूचनाएँ रह जाती है, जबकि कुछ सूचनाएँ सही या अधूरी दी जाती है।
(3) इससे उच्च अधिकारियों का कार्यभार बढ़ जाता है क्योंकि उन्हें अपने सामान्य कार्य के अलावा ऐसी सूचनाओं के आदान-प्रदान का काम भी करना पड़ता है जिनका उनके साथ कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होता।
(4) नौकरशाही को जन्म मिलता है।
(b) अनौपचारिक सम्प्रेषण
(Informal Communication)
अनौपचारिक सम्प्रेषण में सम्वादों व सूचनाओं का आदान-प्रदान संगठन की औपचारिक रचना के अनुसार नहीं, बल्कि भिन्न लोगों के बीच पैदा गैर रस्मी तथा आपसी समझ के सामाजिक रिश्तों के आधार पर होता है। सम्प्रेषण की इस विधि का प्रयोग दो समान स्तर के कर्मचारी और अधिकारियों के बीच होता है। संस्था की ओर से इसकी कोई व्यवस्था नहीं होती है। इस सम्प्रेषण को अंगूरीलता या जन-प्रवाद सम्प्रेषण (Grapevine Communication) भी कहते हैं क्योंकि इसमें सूचना कानों-कान फैलती है-एक ने दूसरे से कहा, दूसरे ने तीसरे से, और फिर तीनों ने अगले तीनों से। इस सूचना के लेने-देने का कोई निश्चित सीधा-सादा रास्ता नहीं होता बल्कि यह उसी तरह टेढ़ा-मेढ़ा होता है जैसे अंगूर की बेल जिसका आदि और अन्त ढूँढना यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य होता है।
अनौपचारिक सम्प्रेषण के लाभ-
(1) अनौपचारिक सम्प्रेषण प्रबन्धकों को संगठन में काम करने वाले भिन्न-भिन्न कर्मचारियों की निजी राय की लगभग सही तथा अच्छी जानकारी करा देता हैं।
(2) अनौपचारिक प्रत्यक्ष सम्प्रेषण के द्वारा सन्देश-प्रेषण तथा सन्देश प्राप्त-कर्ता के बीच सहयोग तथा सद्भाव का विकास होता है।
3) अनौपचारिक प्रत्यक्ष विचारों के आदान-प्रदान का बहुत लचीला माध्यम है क्योकि इसमें पद स्थिति या, आदेश श्रृंखला का कोई ध्यान नहीं रखा जाता।
(4) यह बहुत तेजी से सूचना प्रसारित करने का तरीका है।
अनौपचारिक सम्प्रेषण के दोष-
(1) अधिकतर अनौपचारिक सम्प्रेषण में जो कानों-कान फैलाया जाता है उसमे सच कम और लाग-लपेट अधिक होती है।
(2) इसके कारण बहुधा संगठन में मतभेद व गलतफहमियों को बल मिलता है जिससे असामाजिक तत्व अनुचित लाभ उठाने में सफल हो जाते हैं।
(3) इस सम्प्रेषण को नियन्त्रित करना कठिन होता है क्योंकि न तो इसके आदि और अन्त का ज्ञान किया जा सकता है और न उसके प्रवाह और दिशा को नियन्त्रित किया जा सकता है।
(III) दिशा के आधार पर वर्गीकरण
(Classification on the basis of Direction)
(a) नीचे की ओर सम्प्रेषण (Downward Communication)
ऐसा सम्प्रेषण जो उच्च अधिकारियों से अधीनस्थों की ओर प्रवाहित होता है, नीचे की ओर सम्प्रेषण कहलाता है। एक संगठनीय ढाँचे में अधिकारी को निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अपने अधिकारों का प्रयोग करना चाहिए, जिससे यह अभिप्राय है कि वे निम्न स्तर पर व्यक्तियों को आदेश, संकेत तथा नीति निर्देश देने में लगे रहते हैं, इसे नीचे की ओर सम्प्रेषण कह सकते हैं। इसे एक प्रकार का सामूहिक औपचारिक सम्प्रेषण कहा जा सकता है। बड़े अधिकारियों को ऐसे सन्देश बीच के अधिकारियों के माध्यम से ही देने चाहिए अन्यथा उनके असन्तुष्ट होने का भय रहता है। कार्य सम्बन्धी सूचनाएँ, सामान्य हितों की सूचनाएँ और सेवा की शतों के विषय में सूचनाएँ इसी माध्यम से दो जाती हैं। इस सम्प्रेषण के लिए मौखिक, लिखित, मौखिक एवं लिखित एवं सूचना-पट्ट विधि का प्रयोग किया जाता है। अधोमुखी सम्प्रेषण (Downward Communication) का मुख्य लाभ यह है कि यह सम्पूर्ण संगठन को एक सूत्र में बांधकर एक ही दिशा में आगे बढ़ाता है। इसके कारण निम्न अधिकारियों के कार्यों में तालमेल (co-ordination) रहता है तथा उन्हें उच्च प्रबन्धको की योजनाओं, नीतियो, निर्देशों तथा मांगों की साफ-साफ, तत्काल, सही जानकारी (right knowledge) मिलती रहती है।
( b) ऊपर की ओर सम्प्रेषण
(Upward Communication)
ऊपर की ओर सम्प्रेषण में निम्न स्तर के व्यक्तियों से यह आशा की जाती है कि वे सन्देश उन व्यक्तियों को दें, जो उनसे ऊपर है। यह नीचे की ओर सम्प्रेषण से बिलकुल विपरीत होता है। इस तरह के सम्प्रेषण में न तो श्रमिकों की प्रतिक्रियाएँ व सुझाव सम्मिलित किये जाते हैं और न ही उनकी शिकायतें इत्यादि सम्मिलित की जाती हैं। इस सम्प्रेषण के दो मुख्य उद्देश्य हैं-सर्वप्रथम, निम्न स्तर के कर्मचारियों को कम्पनी की नीतियों व योजनाओं की पूरी स्वतन्त्रता के साथ विवेचना करने का अवसर प्रदान करना, जिससे इनकी कमजोरियों, कमियों तथा गलतियों को जाना जा सके। द्वितीय, निम्न अधिकारियों व कर्मचारियों की कार्य प्रगति, शिकायतें, सुझावों तथा भावनाओं को जानना, जिससे संगठन के लक्ष्यों की प्राप्ति में उन्हें साथ लिया जा सके।
(c) समतल सम्प्रेषण
(Horizontal Communications)
जब सम्प्रेषण एक ही स्तर के अधिकारियों अथवा पृथक-पृथक विभागों के अधिकारियों के बीच होता है तब इसे समतल सम्प्रेषण कहते हैं। सभी विभागों में समन्वय बनाए रखने के लिए समय-समय पर सम्बन्धित अधिकारियों में विचार-विमर्श एवं परामर्श रखने के लिए समय-समय पर सम्बन्धित अधिकारियों में विचार-विमर्श एवं परामर्श आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए, व्यवसायिक संस्था के विपणन प्रबन्धक (marketing managers) के द्वारा उत्पादन प्रबन्धक (production managers) के साथ बातचीत करके किसी तुरन्त सुपुर्दगी वाले आर्डर की तुरन्त पूर्ति कराना। ऐसे सम्प्रेषण का मुख्य उद्देश्य विभिन्न समान स्तर के विभागों के कार्यों में तुरन्त तालमेल पैदा करने में सहायता देना है। कोई भी व्यावसायिक संस्था तब तक सही प्रगति नहीं कर सकती, जब तक इसके सभी विभाग एक-दूसरे के प्रयत्नों, उपलब्धियों तथा समस्याओं से ठीक-ठीक परिचित न हो।
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