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अंतराष्ट्रीय महिला दिवस

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस
👉प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का आयोजन किया जाता है। सर्वप्रथम वर्ष 1909 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का आयोजन किया गया था। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 1977 में इसे आधिकारिक मान्यता प्रदान की गई।
👉विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के उद्देश्य से इस दिन को महिलाओं के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों के उत्सव के तौर पर मनाया जाता है।
👉28 फरवरी, 1909 को संयुक्त राज्य अमेरिका में पहला राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने इस दिन को न्यूयॉर्क में वर्ष 1908 की कपड़ा श्रमिकों की हड़ताल के सम्मान में नामित किया, जहाँ महिलाओं ने कामकाजी परिस्थितियों के खिलाफ विरोध किया था।
👉अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2024 का विषय— ''Invest in women: Accelerate progress'' है। 
👉दुनिया कई संकटों का सामना कर रही है, जिसमें भू-राजनीतिक संघर्षों से लेकर गरीबी के बढ़ते स्तर और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव शामिल हैं। इन चुनौतियों का समाधान केवल महिलाओं को सशक्त बनाने वाले समाधानों से ही किया जा सकता है। महिलाओं में निवेश करके, हम बदलाव ला सकते हैं और सभी के लिए एक स्वस्थ, सुरक्षित और अधिक समान दुनिया की ओर बदलाव को गति दे सकते हैं।

इस दिन को अलग-अलग तरह से मनाया जाता है. जैसे यूक्रेन और इटली में एक-दूसरे को फूल भेंट करके या चीन में काम से छुट्टी देकर.संयुक्त राष्ट्र की साल 2024 की थीम है  ''Invest in women: Accelerate progress'' यह थीम इस बात को रेखांकित करती है कि लैंगिक समानता से जुड़े उपायों के लिए कितना कम फंड दिया जाता है.अगर दुनिया को साल 2030 तक लैंगिक समानता के लक्ष्य को पाना है तो अतिरिक्त 360 अरब डॉलर (करीब 298 खरब रुपये) की ज़रूरत होगी.

सरकारी मदद का सिर्फ़ 5% महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा से निपटने और 0.2% से कम इसकी रोकथाम में इस्तेमाल होता है स्रोतः संयुक्त राष्ट्र 
आमतौर पर बात किया जाए तो इसे अंतरराष्ट्रीय बनाने का ख़याल सबसे पहले क्लारा ज़ेटकिन नाम की एक महिला के ज़हन में आया था.
क्लारा जेटकिन (जन्म 5जुलाई 1851-मृत्यु 20जून 1993)

क्लारा एक वामपंथी कार्यकर्ता थीं. वो महिलाओं के हक़ के लिए आवाज़ उठाती थीं. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का सुझाव, 1910 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में कामकाजी महिलाओं के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दिया था.


आइए जाने भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति



अन्य सम्बन्धित शीर्षक, नारी जागरण, नारी-उत्थान, विकासशील भारत एवं नारी (2002), भारतीय समाज में नारी की स्थिति (2004), स्वातन्त्र्योत्तर भारत में महिला, आधुनिक नारी की समस्याएँ, आधुनिक भारत में नारी का स्थान (2000)।

"नारी को बन्दिनी बनाने का आशय है,
पशु अधिकृत है किए मनुज को अभी जगत् में।"
                                  -सुमित्रानन्दन पन्त
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[रूपरेखा (1) प्राचीनकाल में नारी, (2) नारी की स्थिति में परिवर्तन (3) समाज के छद्‌मपाश में बंधी नारी, (4) भारतीय नारी और समाज सुधारक (5) भारतीय नारी बलिदान को प्रतिमा, (6) भारतीय नारी के दृष्टिकोण एवं जीवन-शैली में अपेक्षित परिवर्तन, (7) उपसंहार।]
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प्राचीनकाल में नारी- बात किया जाए अगर प्राचीन काल की महिलाओं की स्थिति के बारे में बहुत ही बेकार था जिसे आगे प्रस्तुत की व्याख्या किया गया है जिसमें महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया जाता था उनके साथ भेदभाव किया जाता था इन सभी का चित्रण प्रस्तुत करना भी बाकी  है, प्राचीन काल में स्त्रियां पुरुषों के समान नहीं थीँ उनके साथ अभद्र व्यवहार किया था लेकिन इसके विषय में आज उल्टा बताया जा रहा है की  पुरुष दोनों को ही अभिनय करना पड़ता है। देश के निर्माण में पुरुषों के साथ स्त्रियों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भारतीय समाज में नारियों की पूजा विभिन्न रूपों में होती रही है।  लेकिन प्राचीन भारत के इतिहास के पृष्ठ भारतीय महिलाओं को गौरव गाथा से भरे हुए  नहीं हैं। अतीतकाल में नारियों को पुरुष के समान अधिकार प्राप्त नहीं थे, परिवार में उनका स्थान प्रतिष्ठापूर्ण  नहीं था, गृहस्थी का कोई भी कार्य उनकी सहमति के बिना नहीं हो सकता था। इस विषय में चित्र प्रस्तुत नहीं किया गया है अभी अध्ययन किया जा रहा है खोजा जा रहा है ताकि उन सच को सामने लाया जा सके धन्यवाद।
नारी की स्थिति में परिवर्तन-समय के परिवर्तन के साथ-साथ स्त्रियों की स्थिति में भी परिवर्तन होता गया। प्रेम, बलिदान तथा सर्वस्व-समर्पण ही स्त्रियों के लिए विष बन गया। समाज की घृणित विचारधारा ने उसका क्षेत्र केवल घर की चहारदीवारी तक ही सीमित कर दिया। आदर्शवादी एवं समाज-सुधारक गोस्वामी तुलसीदास ने नारी की इस स्थिति का चित्रण इन शब्दों में किया है-

कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं।
 पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।।

मुगलकाल में परदा-प्रथा आरम्भ हुई और स्त्री को शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। परदे की आड़ लेकर उसे घर की चहारदीवारी में कैद कर दिया गया। तभी से नारी विवशता की बेड़ियों में जकड़ी स्वाधीनता की बाट जोह रही है।

समाज के छद्मपाश में बँधी नारी-नारी ने प्रेम के वशीभूत होकर स्वयं को पुरुष के चरणों में समर्पित कर दियाः किन्तु निर्दयी पुरुष ने उसे बन्धनों में जकड़ लिया। वही नारी, जिसने अपने पति को पराजय से क्षुब्ध होकर महान् विद्वानों से शास्त्रार्थ किया था, घर की सीमित परिधि में ही बन्द होकर रह गई। वह अज्ञान के गहन गर्त में डुबकियाँ लगाने तथा सामाजिक प्रताड़नाओं को मूक पशु के समान सहन करने के लिए विवश रही। छोटी अवस्था मे बेमेल विवाह तथा कभी-कभी भाग्य को विडम्बना के कारण विधवा होकर जीवनपर्यन्त आँसू बहाते रहना पड़ता था। स्त्रियों का जीवन पुरुषों की दया पर निर्भर रहता था; क्योंकि उत्तराधिकार आदि से उसे बंचित रखा गया था। आर्थिक एवं सामाजिक कुरीतियों ने पराधीन भारत में नारियों को इतना दीन-हीन बना दिया था कि वे अपने अस्तित्व को ही भूल गई थीं। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने नारी की इसी शोचनीय दशा का वर्णन निम्नलिखित पंक्तियों में किया है-

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।।

भारतीय नारी और समाज सुधारक- धीरे-धीरे भारतीय विचारकों एवं नेताओं का ध्यान स्त्री-दशा में सुधार की ओर आकर्षित हुआ। राजा राममोहनराय ने सती प्रथा (पति के शव के साथ पत्नी को सती होने के लिए विवश करना) का अन्त कराने का सफल प्रयास किया। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने पुरुषों को भाँति महिलाओं को भी समान अधिकार दिए जाने पर बल दिया। गांधीजी सहित अन्य अनेक नेताओं ने महिला उत्थान के लिए जीवनपर्यन्त कार्य किए। देश की स्वतन्त्रता के साथ-साथ नारी-वर्ग में भी चेतना का विकास हुआ। वह आज घर तक सीमित न होकर पुरुषों के समान कार्य-क्षेत्र में पदार्पण कर रही है। भारतीय संविधान में भी यह घोषणा की गई है कि "राज्य धर्म, जाति, सम्प्रदाय, लिग आदि के आधार पर किसी भी नागरिक में विभेद नहीं करेगा।" 'शारदा एक्ट' एवं 'उत्तराधिकार अधिनियम' द्वारा स्त्रियों की दशा को सुधारने का प्रयास किया गया। आज उन्हें पुरुषों के समान आर्थिक स्वतन्त्रता प्रदान की जा रही है। पिता को सम्पत्ति में पुत्रों की भांति इनके हिस्से की भी कानूनी व्यवस्था की गई है।

भारतीय नारी : बलिदान की प्रतिमा- भारतीय नारी जीवन को कटुता और विषमताओं का विष पीकर भी कर्तव्य और त्याग का सन्देश देती रही है। रानी लक्ष्मीबाई ने अपना बलिदान देकर देश की रक्षा के लिए अंग्रेजो से युद्ध किया। गांधीजी को चरित्र-निर्माण की मूल प्रेरणा देनेवाली उनकी माता पुतलीबाई ही थी। श्रीमती सरोजिनी नायडू, विजयलक्ष्मी पण्डित, इन्दिरा गांधी, राजकुमारी अमृतकौर, डॉक्टर सुशीला नय्यर आदि के रूप में हमें आज वे प्रगतिशील नारी-समाज के दर्शन होते है। इन नारियों ने स्वयं राष्ट्र निर्माण एवं जन-जागरण में भाग लेकर नारी जाति का पथ-प्रदर्शन किया है।

स्वतन्त्र भारत में महिलाओं की प्रगति के लिए हमारी सरकार पर्याप्त ध्यान दे रही है। यद्यपि आज को स्त्रियाँ घर के सीमित कार्य-क्षेत्र को छोड़कर समाज-सेवा की ओर बढ़ रही है तथा उनके हृदय में सामाजिक चेतना उत्पन्न हो रही है; तथापि भारतीय नारी के सामूहिक जागरण के मार्ग में अभी भी अनेक अवरोध हैं। इन अवरोधों को दूर करके ही भारतीय नारी अपना उत्थान कर सकती है।
भारतीय नारी के दृष्टिकोण एवं जीवन-शैली में अपेक्षित परिवर्तन-भारतीय सभ्यता का मूल मन्त्र 'सादा जीवन उच्च विचार' था; परन्तु आज की नारियाँ इस आदर्श से बहुत दूर हैं। आज के संक्रान्ति काल में, जब देश के हजारों व्यक्तियों के पास न खाने को अन्न है और न पहनने के लिए वस्त्र, वे राष्ट्र की अमूल्य सम्पत्ति का व्यय अपने सौन्दर्य प्रसाधनों हेतु कर रही हैं। पुरुषों को मोहित करने के लिए अपने-आपको सजाने एवं सँवारने की पुरातन प्रवृत्ति को वे आज भी नहीं छोड़ सकी हैं। नारी समस्याओं की प्रसिद्ध लेखिका श्रीमती प्रेमकुमारी 'दिवाकर' का कथन है कि "आधुनिक नारी ने निःसन्देह बहुत कुछ प्राप्त किया है, पर सबकुछ पाकर भी उसके भीतर का परम्परा से चला आया हुआ कुसंस्कार नहीं बदल रहा है। वह चाहती है कि रंगीनियों से सज जाए और पुरुष उसे रंगीन खिलौना समझकर उससे खेले। वह अभी भी अपने-आपको रंग-बिरंगी तितली बनाए रखना चाहती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि जब तक उसकी यह आन्तरिक दुर्बलता दूर नहीं होगी, तब तक उसके मानस का नव-संस्कार न होगा। जब तक उसका भीतरी व्यक्तित्व न बदलेगा, तब तक नारीत्व की पराधीनता एवं दासता के विष-वृक्ष की जड़ पर कुठाराघात न हो सकेगा।"

इसके अतिरिक्त स्त्रियों को जीवनपर्यन्त दूसरों पर भार बने रहना पड़ता है। अशिक्षा, अज्ञानता की समस्या, आभूषणप्रियता, बाल-विवाह एवं बेमेल-विवाह आदि अनेक ऐसी विकट समस्याएँ हैं, जिनके द्वारा नारी-प्रगति में अवरोध उत्पन्न हो रहा है।

उपसंहार-उपर्युक्त समस्याओं का निराकरण करके स्त्रियों की स्थिति में सुधार का प्रयास किया जा रहा है, फलस्वरूप आज जीवन के समस्त क्षेत्रों में स्त्रियों ने पदार्पण कर लिया है तथा स्त्रियाँ देश का भाग्य बदलने में सहायक सिद्ध हो रही हैं। आज नारी नवचेतना एवं जागृति की भावना से ओत-प्रोत है। वह अपने अधिकार एवं कर्त्तव्यों का पालन पूर्ण रूप से कर सकने में समर्थ है। आज वह समय आ गया है, जिसकी हमें बहुत समय से प्रतीक्षा थी।

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