अपकृत्य विधि प्रक्रिया पर भी आधारित रही है इंग्लैंड की पूर्वकालीन विधि में अपकृत्य विधि के मामले कुछ निश्चित अपकृत्य की कार्यवाहियों के ही अंतर्गत लाए जाते थे किंतु विधि के विकास के साथ उन कार्यवाहियों का क्षेत्र भी बड़ा और उन अपकृतियों के लिए भी मुकदमा चलाकर क्षतिपूर्ति का अधिकार उत्पन्न हुआ, जिनके संबंध में पहले क्षतिपूर्ति का कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था
अपकृत्य विधि सामान्य विधि पर आधारित है
अपकृत्य अपकृत्य विधि परिनियमित अथवा संहिता वध विधि नहीं है यह विधि किसी विधान मंडल द्वारा बनाई गई विधि नहीं है अपितु के अंतर्गत वे सिद्धांत आते हैं जो समय-समय पर न्यायाधीशों ने न्यायिक निर्णयों में प्रतिपादित किए हैं
वास्तव में मूल रूप मे ये न्यायिक निर्णय इंग्लैण्ड की सामान्य विधि पर ही आधारित है परन्तु परिस्थितियों एवं - न्याकचीशों के विवेक पर आधारित होने के कारण इन सिद्धान्तों में एकरूपता नहीं है। समय और परिस्थितियों के साथ ही नये-नये सिद्धान्तों का उदय होता रहता है इसलिए अपकृत्य-विधि निरन्तर विकासशील बतायी जाती है।
अपकृत्य विधि का अधिकांश भाग वाद विधि पर आधारित है। वर्तमान में स्थिति यह है कि न्यायाधीश विशद नियमों की चर्चा करने से कतराते हैं और केवल प्रस्तुत समस्या को ही निपटाने तक सीमित रहना पसन्द करते हैं। इस प्रकार वे समस्याओं के निपटारे के लिए पूर्व निर्धारित सिद्धान्तों को ही आधार मानते हैं।
यदि कभी इस सम्बन्ध में विशद विवेचन की आवश्यकता पड़े तो वे पूर्व निर्धारित सिद्धान्तो को ही विस्तार देने का प्रयास करते हैं। हाँ, यदि समस्या बिल्कुल पृथक और एकदम नयी हो तो कभी-कभी वे नये सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं। इस प्रकार नये सिद्धान्तों के प्रतिपादन में भी वे पूर्व निर्धारित सिद्धान्त को एक नया प्रयोग का रूप देना अधिक पसन्द करते हैं।
वास्तव में यह वाद-विधि की विशेषता है कि उसमें नये सिद्धान्तों एवं परिभाषाओं की विशद व्याख्या के अवसर बहुत ही कम रहते हैं। इस सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण के कारण हमारी अपकृत्य-विधि में जहाँ स्वरूपहीनता (Formlessness) आती है वहीं नम्यता (Flexibility) का गुण भी आता है जो विधि को सामयिक एवं उपयोगी बनाने में सहायक होता है।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जो अपकृत्य विधि अंग्रेजी शासन काल में भारत में लागू की जाती थी वह इंग्लैण्ड की सामान्य विधि (Common law) पर आधारित थी और हमारी आज की अपकृत्य-विधि के अनेक सिद्धान्त आज भी वही हैं जो ब्रिटिश शासन-काल में भारतीय न्यायालयों में लागू होते रहे हैं।
भारत में अपकृत्य विधि का विकास
भारत में अपकृत्य विधि सामान्यता अंग्रेजी अपकृत्य विधि पर आधारित है। अपकृत्यों के लिए नुकसानी के वादों में न्यायालय अंग्रेजी कामन ला का अनुसरण करते हैं जहाँ तक वह साम्या, न्याय एवं अच्छे अन्तःकरण के अनुरूप हो। इससे भन्न निर्णय तव दिया जाता था जब कोई विशिष्ट नियम अयुक्तियुक्त या भारत की दशाओं के अनुकूल नहीं होता था। उदाहरण के लिए अपमान वचन (Slander) के लिए अनुयोग के विशेष नुकसान के साक्ष्य का नियम तथा सामान्य नियोजन (Common employment) का सिद्धान्त यद्यपि इंग्लैण्ड में प्रचलित थे परन्तु भारत में मान्य नहीं थे। इसी प्रकार राज्य के प्रतिनिधिक दायित्य पोषण (Maintenance) तथा वाद-क्रय या वाद व्यवसाय (Champerty) के नियमों की स्थिति में इंग्लैण्ड से भिन्न थी।
स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भी सामान्यतया भारतीय न्यायालय इंग्लैण्ड में प्रचलित अपकृत्य विधि का ही अनुसरण करते हैं, परन्तु किसी नियम को लागू करते समय यह ध्यान रखते हैं कि नियम युक्तियुक्त है तथा भारतीय दशाओं के लिए उपयुक्त है। जब कभी भारतीय न्यायालय यह पाते हैं कि कोई विशिष्ट नियम अयुक्तियुक्त है अथवा भारतीय दशाओं के लिए उपयुक्त नहीं है तो वह उससे अलग नियम प्रतिपादित करने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं। इसका उदाहरण कठोर दायित्व (Strict liability) का नियम या सिद्धान्त खतरनाक कार्यकलापों के सन्दर्भ में है। एम० सी० मेहता बनाम भारतीय संघ (M.C. Mehta v. Union of India),जो ओलियम गैस रिसन वाद (Oleum Gas Leak Case) के नाम से विख्यात है, में उच्चतर न्यायालय की पूर्ण पीठ की ओर से निर्णय देते हुए प्रधान न्यायमूर्ति पी० एन० भगवती (P. N. Bhagwati, CJ) ने कहा कि इंग्लैण्ड या किसी विदेशी देश में जो विधि प्रचलित है उसके आधार • पर हम अपने न्यायिक विचार को प्रतिबन्धित नहीं कर सकते। हमें अब विदेशी विधिक व्यवस्था की वैशाखियों की आवश्यकता नहीं है। जिस स्रोत से भी प्रकाश आये हम उसे प्राप्त करने के लिए तैयार हैं, परन्तु हमें अपना विधिशास्त्र निर्मित करना है। हम यह तर्क नहीं' स्वीकार कर सकते कि नयी विधि खतरनाक कार्यकलापों के मामलों में इंग्लैण्ड में रिलैण्डस बनाम फ्लेचर के वाद में प्रतिपादित कठोर दायित्व के अनुरूप नहीं है। हम भारत में अपने हाथ बाँधकर नहीं रह सकते हैं। मुख्य न्यायमूर्ति भगवती ने कहा कि वह एक नये सिद्धान्त को प्रतिपादित करने का साहस कर रहे हैं जिसे अंग्रेजी न्यायालयों ने भी नहीं किया है।
मुख्य न्यायमूर्ति भगवती ने कहा कि जहाँ कोई उद्यम खतरनाक कार्यकलाप में रत है तथा दुर्घटना में किसी व्यक्ति को विषैली गैस के परिणामस्वरूप क्षति पहुँचती है तो ऐसा उद्यम उस व्यक्ति के प्रति कठोर तथा पूर्णरूप से प्रतिकर देने को बाध्य होगा तथा ऐसा दायित्व राइलैण्ड बनाम फ्लेचर के नियम के अपवादों के अध्यधीन नहीं होगा। प्रतिकर का परिणाम उद्यम की विशालता तथा क्षमता के अनुपात में होगा। क्योंकि प्रतिकर का प्रभाव निवारक होना चाहिए। जितना विशाल तथा अधिक समृद्ध उद्यम होगा उतना ही अधिक प्रतिकर होगा।
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा प्रतिपादित उपर्युक्त नियम तथा व्यक्त उपर्युक्त विचार प्रशंसनीय हैं, परन्तु कुल मिलाकर भारतीय न्यायालयों ने अपकृत्य विधि के विकास के मामले में उदासीनता ही अधिक दिखाई। स्वतंत्रता-प्राप्ति के वर्षों बाद भी भारत में अपकृत्य विधि की स्थिति शोचनीय है। भोपाल गैस रिसन विनाश (2-3 दिसम्बर, 1984) ने अपकृत्य विधि के विकास के सम्बन्ध में भारतीय न्यायालयों की सुस्ती, अक्षमता एवं उदासीनता को प्रकाश में लाया। 8 अप्रैल, 1985 को भारतीय संघ ने यूनियन कारबाइड कार्पोरेशन के विरुद्ध एक वाद न्यूयार्क के दक्षिणी जिले के संयुक्त राष्ट्र जिला न्यायालय में दायर किया तथा न्यायालय से प्रार्थना की कि वह पीड़ितों हेतु उचित नुकसानी प्रदान करे। यूनियन कारबाइड कार्पोरेशन ने तर्क किया कि वाद करने का उचित तथा सुविधाजनक स्थान (Forum Non Conve- nience) न्यूयार्क (अमेरिका) न होकर भोपाल (भारत) था। इसके उत्तर में भारतीय संघ का कहना था कि वाद न्यूयार्क में ही चलना चाहिए। भारतीय संघ ने स्वीकार किया कि भारत में अपकृत्य विधि की स्थिति दयनीय तथा शोचनीय है। भारतीय प्रणाली में विलम्ब बड़ा होता है तथा भारतीय न्यायालयों की प्रणाली में इस मुकदमे के निस्तारण की प्रक्रियात्मक तथा व्यवहारिक क्षमता नहीं है। इसके अतिरिक्त भारतीय विधिशास्त्र में अपकृत्य विधि की बहुत कमी है। इस वाद के समकक्ष पूर्वोक्ति भी नहीं है। इसके कारण आपराधिक उपायों की ओर अधिक ध्यान देना विनिर्दिष्ट अनुतोष तथा वाद दायर करने में लगने वाली अत्यधिक फार्म है।
1975 से 1985 तक एक दशक के अपकृत्य विधि के पर्यवेक्षण से यह प्रकट हुआ कि केवल 56 वाद उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों द्वारा रिपोर्ट हुये तथा इनमें से उपेक्षा सम्बन्धी अपकृत्य के केवल 22 वाद थे। इसमें से कोई वाद उत्पादक दायित्व पर नहीं था तथा न ही इनमें से कोई वाद औद्योगिक प्रक्रियाओं या रासायनिक या उसके समान प्रक्रियाओं द्वारा क्षति के परिणामस्वरूप नहीं आया। सारवान विधि के अभाव के साथ-साथ ऐसी प्रक्रियायें या ढंगों का अभाव है जो इतने भारी विनाश की जटिल मुकदमेबाजी के निस्तारण के लिए आवश्यक है। वकीली में विशेषज्ञता का अभाव, अपकृत्य विधि में तथा न्यायपालिका में अनुभव का अभाव, अनुपयुक्त प्रक्रियायें, जाँच का कौशल या द्रव्य आदि की कमी कारण हैं जिनसे भारतीय प्रणाली इस कार्य को करने में अक्षम है।
जहाँ एक ओर भारत ऐसे प्रभुत्वसम्पन्न शासन के लिए एक विदेशी न्यायालय के समक्ष यह स्वीकार करना शर्मनाक है कि उसकी अपनी विधिक प्रणाली घटिया या अवर, अक्षम तथा अनुपयुक्त है, यह स्वीकार करना पड़ेगा कि यह वास्तविकता है कि भारत में अपकृत्य विधि अभी भी अविकसित तथा उपेक्षा की स्थिति में है। यह स्थिति बड़ी ही शोचनीय है। परन्तु सबसे अधिक दुर्भाग्य की बात यह है कि विधि की इस शाखा का विकास करने के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है। भारतीय न्यायिक प्रणाली में वाद निस्तारण में विलम्ब अपकृत्य दावे दायर करने में अत्यधिक न्यायालय फीस, कानूनी जागृति का अभाव आदि इस दशा के कुछ कारण है।
भारत में अपकृत्य विधि न्यायिक निर्णयों पर आधारित है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् अंग्रेजी निर्णय भारतीय न्यायालयों पर बाध्यकारी नहीं हैं। उनका केवल अनुनयी (Persua- sive) महत्त्व है, परन्तु सामान्यतः उनका अनुसरण किया जाता है। भारत में विधि की अन्य शाखाओं का संहिताकरण हुआ है, परन्तु अपकृत्य विधि की अवहेलना की गई है। अपकृत्य विधि के केवल कुछ ही भागों का संहिताकरण किया गया है, जैसे विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963: घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855; नियोजक दायित्व अधिनियम, 1939 तथा 19881 इसके - अतिरिक्त मोटर यान अधिनियम, 1988; उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986; लोक दायित्व अधिनियम, 1991 आदि भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कदाचित् भारत में अपकृत्य विधि इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि एक व्यापक संहिता बनायी जा सके।
अपकृत्य की अर्थ एवं परिभाषा
अपकृत्य अंग्रेजी भाषा के शब्द अपकार (Wrong) का पर्यायवाची है। नार्मन विधिवेत्ताओं ने यह शब्द अंग्रेजी भाषा तथा विधि साहित्य में पहली बार प्रयोग किया था। आज इस शब्द का अर्थ उस कृत्य से है जिससे कि किसी व्यक्ति विशेष को विधिक क्षति पहुँचे, चाहे वह कृत्य जान-बूझकर किया गया हो अथवा नहीं और जिससे कि क्षतिकर्ता को हर्जाना या क्षतिपूर्ति देनी पड़े। अक्सर किसी व्यक्ति विशेष को संविदा भंगीकरण द्वारा भी क्षति पहुँचती है, किन्तु अपकृत्य विधि के अन्तर्गत ऐसे अपकारपूर्ण कृत्यों को स्थान नहीं दिया जाता है। इसके विपरीत, व्यक्तिगत सम्बन्धों के प्रति उदासीन रहने वाले कृत्यों से भी क्षति पहुँचती है। इन्हें भी अपकृत्य के अन्तर्गत सम्मिलित नहीं किया जाता है। अपकृत्य के अन्तर्गत केवल वे अपकारपूर्ण कृत्य रखे जा सकते हैं जिनमें कि क्षति सर्वसाधारण के प्रति कर्त्तव्यों को न पूरा करने के कारण हुई है और जिस क्षति की पूर्ति करने के लिए क्षतिपूर्ति देना पड़े। विभिन्न विद्वानों ने अपकृत्य की परिभाषा विभिन्न प्रकार दी है-
(1) चैम्बर्स शब्दकोश 'चैम्बर्स शब्दकोश' के अनुसार, "अपकृत्य वह क्षतिपूर्ण या अनुचित कृत्य है जिसका उदय संविदा को भंग करने के कारण न हुआ हो और जिससे पहुँची क्षति को पूरा करने का एकमात्र उपाय क्षतिपूर्ण ही हो।"
(2) सामण्ड- अपकृत्य एक सिविल अपकार है जिसके लिए कामन लॉ के अन्तर्गत अनिर्धारित हर्जान (unliquidated damages) की प्राप्ति के लिए कार्यवाही की जा सकती है।
यदि किसी ने स्पष्ट रूप से संविदा-भंग, न्याय भंग या किसी अन्य मात्र साम्यिक आधार को भंग किया है, तो ऐसा कृत्य अपकृत्य नहीं कहा जायगा।
(3) डॉ० अण्डरहिल के अनुसार "अपकृत्य संविदा से पूर्णतया एक कृत्य है जो किसी व्यक्ति के पूर्ण अधिकार को भंग करता है या किसी व्यक्ति के परिमित अधिकार को भंग करता है या किसी व्यक्ति के परिमित अधिकार (Qualified Right) को भंग करके उसको क्षति पहुँचाता है अथवा किसी सार्वजनिक अधिकार की इस प्रकार अवहेलना करता है जिससे कि किसी व्यक्ति विशेष को सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक क्षति पहुँचती है और परिणामस्वरूप वह क्षतिकर्ता के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का मुकदमा चलाने का अधिकारी हो जाता है।
अण्डरहिल की परिभाषा के अनुसार अपकृत्य के तीन अनिवार्य तत्त्व हैं-
(1) एक कृत्य का किया जाना ऐसा नहीं होना चाहिए कि वह कृत्य किसी संविदा की शर्तों को भंग करने के कारण क्षतिपूरित हो गया हो।
(2) कृत्य को ऐसा न होना चाहिए जिसको न करने का हमें विधिक अधिकार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्राप्त हो।
(3) अपकारपूर्ण कृत्य द्वारा किसी व्यक्ति के न्यायिक अधिकारों का भंग होना आवश्यक
है।
संक्षेप में अपकृत्य-
(1) किसी व्यक्ति के ऐसे पूर्ण अधिकार का उल्लंघन है जिसका कि वह व्यक्ति हकदार
है, या
या
(2) किसी अन्य व्यक्ति के सीमित अधिकार का उल्लंघन है जिससे उसको क्षति होती है,
(3) किसी सार्वजनिक, अधिकार का उल्लंघन है जिसके फलस्वरूप किसी व्यक्ति को, जनसाधारण को होने वाली क्षति से कहीं अधिक सारपूर्ण एवं विशिष्ट क्षति हुई है, तथा जिससे क्षति प्राप्त व्यक्ति को हजनेि के लिए वाद दायर करने का अधिकार उत्पन्न होता है।
संविदा भंग- जब मनुष्य किसी व्यक्ति या संस्था के साथ किसी प्रकार की संविदा करता है जो वह अपने ऊपर किसी कृत्य को करने न करने का उत्तरदायित्व लेता है। इस प्रकार के विधिक कर्तव्यों का पालन न करने से भी हमारे ऊपर दीवानी दायित्व आ जाते है। परिणामस्वरूप, हमें पीड़ित अर्थात् क्षति प्राप्त व्यक्ति को हर्जाना या क्षतिपूर्ति देनी पड़ती है। अपकृत्य विधि ऐसे कृत्यों को अपने क्षेत्र में नहीं लेती है। ऐसे क्षतिपूर्तिजनक कृत्यों का अध्ययन संबिदा अधिनियम के अन्तर्गत किया जाता है। संविदा हमारी अनुमति के बिना नहीं हो सकती, पर अपकृत्य में अनुमति की आवश्यकता नहीं है। अपकृत्य विधि के अनुसार, किसी कृत्य को अतिपूर्ण या अनुचित होने के लिए यह आवश्यक है कि ऐसे क्षतिपूर्ण कृत्य का उदय हमारे ऐसे विविध कर्तव्य को पूरा न करने के कारण हुआ हो जिसको पूरा करना हमारा विधिक कर्त्तव्य है।
यद्यपि अपकृत्य, संविदा-भंग एवं अपराध में अन्तर है तथापि कभी-कभी कुछ परिस्थितियों में. एक ही कृत्य इन सभी श्रेणियों में अथवा किन्हीं दो की श्रेणियों में आ सकता है। इस प्रकार के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं-
कब एक ही कृत्य अपकृत्य तथा संविदा भंग है ? (When the same act can be considered as a Tort and a Breach of Contract ?)
जब कभी एक ही कृत्य द्वारा विधि द्वारा निर्धारित कर्त्तव्यों के उल्लंघन के साथ-साथ संविदा द्वारा निर्धारित कर्त्तव्यों का हनन होता है तब वह कृत्य अपकृत्य एवं संविदा भंग दोनों ही हो सकता है।
उदाहरण के लिए- एक व्यक्ति 'A' अपने पुत्र 'B' की चिकित्सा के लिए एक डॉक्टर 'C' की नियुक्ति करता है। डॉक्टर 'C' के किसी अविवेकपूर्ण कृत्य से पुत्र 'B' को आघात पहुँचता है। यहाँ पिता 'A' डॉक्टर 'C' के विरुद्ध संविदा-भंग के लिए मुकदमा चला सकता है तथा पुत्र 'B' डॉक्टर 'C' के विरुद्ध अपकृत्य के लिए मुकदमा चला सकता है। इस प्रकार डॉक्टर का एक ही कृत्य अपराध एवं संविदा-भंग दोनों ही है।
कब एक ही कृत्य अपकृत्य तथा अपराध है ?
(When the same act can be considered as a Tort and Crime ?)
कोई कृत्य जब एक ही व्यक्ति के प्रति किये कृत्य के रूप में समझा जाता है तब वह
अपकृत्य होता है जबकि वही कृत्य जब समस्त समाज के प्रति किया गया समझा जाता है तो अपराध हो जाता है। इस प्रकार कोई कार्य जो अपराध है, अपकृत्य भी हो सकता है यदि उससे किसी व्यक्ति विशेष को क्षति हुई हो।
आक्रमण, अपमानजनक लेख, असावधानी, अप्रदूषण आदि ऐसे कृत्य हैं जो अपराध होने के साथ-साथ अपकृत्य भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए सार्वजनिक मार्ग पर कोई ऐसा अवरोध उत्पन्न करना जिससे समाज के व्यक्तियों को असुविधा हो, सार्वजनिक अप्रदूषण (Public Nuisance) का अपराध है। जब इसी सार्वजनिक अपदूषण के कारण किसी व्यक्ति को क्षति पहुँचती है तो यह अपकृत्य भी हो जायेगा और क्षतिग्रस्त व्यक्ति अवरोध उत्पन्न करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध क्षतिपूर्ति के लिए अपकृत्य विधि में वाद ला सकता है।
इस प्रकार के मामलों में व्यक्ति को दण्ड के साथ-साथ क्षतिपूर्ति के लिए भी बाध्य किया जा सकता है। ऐसे मामलों में दीवानी एवं आपराधिक उपचार समवर्ती एवं स्वतंत्र होते हैं न कि वैकल्पिक। भारत में यह न्यायालयों की मान्यता है कि एक ही दोषपूर्ण कार्य के लिए क्षतिग्रस्त व्यक्ति क्षतिकर्ता से क्षतिपूर्ति भी ले सकता है और उसे आपराधिक रूप से दण्ड भी दिया जा सकता है।
क्या एक ही कृत्य अपकृत्य, अपराध तथा संविदा-भंग हो सकते हैं ? (When the same act can be considered as a Tort, Crime and Breach of Contract?)
यद्यपि संविदा भंग, अपराध तथा अपकृत्य तीनों ही अलग-अलग कोटि के कृत्य है, परन्तु एक ही कृत्य का केवल (1) अपकृत्य, (2) अपकृत्य तथा अपराध या (3) अपकृत्य, अपराध तथा संविदा भंग एक साथ तीनों होना सम्भव है। उदाहरण एक व्यक्ति मोटरगाड़ी खरीदता है और अपने नगर की नगरपालिका से यह संविदा करता है कि वह मोटर को नगरपालिका के क्षेत्र में 30 मील प्रति घण्टा की रफ्तार से अधिक नहीं चलायेगा। मान लीजिए वहाँ की दण्ड संहिता मैं यह व्यवस्था है कि कोई व्यक्ति जो लापरवाही से और तीव्र गति से मोटर चलायेगा उसे दण्ड दिया जायेगा। ऐसी परिस्थिति में यदि उक्त मोटर का स्वामी मोटर को 40 मील प्रति घण्टा की गति से चलाकर किसी व्यक्ति को घायल कर देता है, तो एक ही कृत्य के लिए उस व्यक्ति पर तीन-तीन मुकदमे चल सकेंगे- (
1) नगरपालिका पर इस बात का मुकदमा चलायेगी कि उसने संविदा की शर्तों को तोड़ा
(2) उस देश की सरकार दण्ड संहिता की व्यवस्थाओं का उल्लंघन करने के लिये उस पर अपराध विधि के अन्तर्गत मुकदमा चलायेगी और अपराधी सिद्ध होने पर उसको दडित करेगी।
(3) इसके अतिरिक्त किस व्यक्ति को मोटर द्वारा चोट आई है यह क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए दीवानी न्यायालय में अलग से मुकदमा चलायेगा। इसी कारण एक ही घटना अपकृत्य,
संविदा भंगीकरण एवं अपराध तीनों या इन तीनों का कोई भी समूह बन सकते हैं। इस प्रकार इस उपर्युक्त कृत्य के लिए उपर्युक्त व्यक्ति को अपराध हेतु अपराध न्यायालय
में अभियोजित किया जा सकता है और अपकृत्य एवं संविदा भंग के लिए दीवानी न्यायालय में मुकदमा चलाया जा सकता है। यह ज्ञातव्य है कि दीवानी अदालत में अथवा संविदा-भंग में से किसी एक के लिए वाद लाया जा सकता है।
इंग्लैण्ड में न्यायालयों का दृष्टिकोण यह है कि इस प्रकार के दोषी व्यक्ति पर पहले अपराध न्यायालय में मुकदमा चलाया जाय और तब तक दीवानी अदालत में क्षतिपूर्ति का वाद न चलाया जाय। भारत में ऐसी कोई पाबन्दी नहीं है और क्षतिग्रस्त व्यक्ति क्षतिकर्ता के विरुद्ध सीधे दीवानी अदालत में क्षतिपूर्ति के लिए वाद ला सकता है।
अपकृत्य तथा संविदा-भंग में भेद
(Difference between Tort and Breach of Contract)
अपकृत्य तथा संविदा-भंग में प्रमुख भेद निम्न प्रकार हैं-
(1) अपकृत्य में हम ऐसे कर्तव्यों को भंग करते हैं जिनको किसी देश की न्याय-प्रणाली ने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्धारित किया है, जबकि संविदा भंगीकरण में हम उन कर्तव्यों
को भंग करते हैं जिनको करने या न करने का दायित्व हमने अपनी इच्छा से स्वीकार किया है।
(2) अपकृत्य वे कृत्य हैं जिनमें ऐसे कर्तव्यों को भंग किया गया हो, जिसको परिपूर्ण करना हमारा कर्तव्य है और जो प्रत्येक व्यक्ति के प्रति होते हैं, किन्तु संविदा भंगीकरण में हम जिन कर्तव्यों को भंग करते हैं, वे ऐसे कर्त्तव्य होते हैं जिनकी हमें निश्चित व्यक्तियों के प्रति करना आवश्यक है और जिनको करने के लिए हमने उन निश्चित व्यक्तियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वचन दिया है। दूसरे शब्दों में अपकृत्य जनसाधारण के प्रति कर्तव्यों का उल्लंघन है, पर संविदा भंगीकरण में जिस कर्त्तव्य का उल्लंघन किया जाता है वह ऐसा कर्त्तव्य होता है जो किसी व्यक्ति विशेष के प्रति होता है।
(3) संविदा भंगीकरण में संविदा की शर्तों को तोड़ने वाले व्यक्ति का उद्देश्य महत्त्वहीन है, किन्तु अपकृत्य में प्रायः उद्देश्य पर विचार किया जाता है।
(4) संविदा की शर्तों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को जो धनराशि विपक्षी को देनी पड़ती है, वह उसकी हानि के लिए दी जाती है, किन्तु अपकृत्य में यह आवश्यक नहीं है। अपकृत्य में कभी-कभी क्षतिपूर्ति निरोधात्मक उद्देश्य से भी दी जाती है। क्षतिपूर्ति इस कारण दी जाती है कि अन्य व्यक्ति भविष्य में इस प्रकार का क्षतिपूर्ण कार्य न करें।
(5) अपकृत्य में क्षति की धनराशि पूर्व निश्चित नहीं होती। संविदा भंगीकरण में क्षति की धनराशि पूर्व निश्चित होती है।
अपकृत्य तथा अपराध में भेद
(Difference between Tort and Crime)
अपकृत्य तथा अपराध में निम्नलिखित अन्तर हैं-
(1) अपराध वह अवैध कृत्य है जो कानून द्वारा इस कारण वर्जित है कि वह समाज के लिए प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से घातक है इस प्रकार के वर्जित कृत्य को करने से ही व्यक्ति अपराधी कहा जाता है और दण्ड का भागी होता है, किन्तु अपकृत्य तो केवल सर्वसाधारण के प्रति हमारे जो कर्तव्य हैं उनको न करने मात्र से उदित होता है।
(2) अपकृत्य में क्षतिकर्ता को क्षतिप्राप्त व्यक्ति को क्षतिपूर्ति देकर मुक्ति मिल जाती है, किन्तु अपराधी को राज्य दण्डित करता है।
(3) अपकृत्य में क्षतिप्राप्त व्यक्ति क्षतिकर्ता पर कानूनी कार्यवाही करता है, पर अपराध को समस्त समाज के विपरीत अनैतिक कृत्य माना जाता है। अपकृत्य में व्यक्ति विशेष के अधिकारों को भंग किया जाता है, जबकि अपराध समाज के विरुद्ध किया गया अनैतिक कृत्य है।
(4) अपराध के रोकने का उत्तरदायित्व राज्य अपने ऊपर लेता है और अपराधी को दण्ड देकर उसको अपराध करने से रोकने का प्रयत्न करता है, इसके विपरीत, अपकृत्य को राज्य इतना गहन एवं सामाजिक दृष्टि से हानिकारक नहीं मानता है कि उनको रोकने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले। इस कारण अपकृत्य रूपी अनुचित एवं क्षतिपूर्ति कृत्य करने वाले को राज्य दण्डित नहीं करता है। यदि क्षतिप्राप्त व्यक्ति क्षतिकर्ता पर मुकदमा चलाकर क्षतिपूर्ति वसूलना चाहे तो वह ऐसा कर सकता है और देश की दीवानी व्यवस्था उसको सहायता करती है।
(5) अपराध में मुख्य उद्देश्य अपराधी को दण्ड देकर अपराध की प्रवृत्ति को रोकना ही सर्वोपरि माना जाता है, किन्तु अपकृत्य में क्षतिग्रस्त की क्षति को पूरा करना ही मुख्य उद्देश्य
(6) अपकृत्यकर्ता द्वारा जो राशि क्षतिपूर्ति के लिए वसूल की जाती है यह क्षतिप्राप्त व्यक्ति को मिलती है, किन्तु अर्थदण्ड के रूप में वसूली हुई समस्त धनराशि राजकीय कोष में जाती है।
(7) अपराध करने वाले व्यक्ति पर राज्य स्वयं कानूनी कार्यवाही करता है, पर अपकृत्यकर्त्ता पर राज्य अपनी ओर से स्वतः कोई कार्यवाही नहीं करता, बल्कि क्षतिप्राप्त व्यक्ति को ही क्षतिपूर्तिकर्त्ता पर कानूनी कार्यवाही (यदि वह करना चाहे) करनी पड़ती है। विनफील्ड के अनुसार अपराध ऐसा अपकार है जिसके पीछे दण्ड की शक्ति (Sanction) होती है।
(8) विनफील्ड के अनुसार, अपराध के सन्दर्भ में क्षतिप्राप्त व्यक्ति क्षतिपूर्ति की माँग अधिकार के रूप में नहीं कर सकता है, पर अपकृत्य के सन्दर्भ में वह निश्चित ही ऐसा कर सकता है।
अपकृत्य तथा न्यास-भंग में भेद
Difference between Tort and Breach of Trust) (
न्यास केवल किसी आधार का पालन मात्र नहीं होता, जैसे कि शब्द न्यास से संकेत मिलता है। यह एक ऐसा आभार है जिसका पालन अदालत द्वारा कराया जाता है। न्यास का उदय तब होता है जब कोई व्यक्ति, जिसे न्यासकर्ता कहते हैं, किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में सम्पत्ति हस्तांतरित करता है जिसे हितग्राही कहते हैं। अब यदि न्यासधारी न्याय के अधीन सम्पत्ति का दुरुपयोग करता है या उसे हस्तांतरित कर देता है तो वह उस न्यास-भंग के लिए उत्तरदायी होगा। प्रश्न यह है कि न्यासभंग तथा अपकृत्यात्मक उत्तरदायित्व में क्या भेद है ?
इसमें निम्नलिखित भेद है- (1) अपकृत्य एक विश्वबन्धी अधिकार (राइट इन रेम) का उल्लंघन है जबकि न्यास-भंग एक व्यक्ति सम्बन्धी (राइट इन परसनम) का उल्लंघन है।
(2) अपकृत्य में अनिर्धारित हर्जाने के लिए वाद दायर करने का अधिकार सृजित होता है न्यासभंग के लिए की जाने वाली कार्यवाही अनिर्धारित हर्जाने की वसूली के लिए कार्यवाही नहीं होती। हितग्राही का दावा सामान्यतः एक साधारण संविदात्मक ऋण के लिए होता है। व्यक्तिगत रूप से न्यासधारी के दायित्व की सीमा न्यास की सम्पत्ति को पहुँची हानि तक ही सीमित होता है और यह उपाय उस व्यक्ति के विरुद्ध होता है जिसके हाथ में सम्पत्ति होती है। इस प्रकार यह दायित्व न्यास को हुई हानि अथवा वहाँ तक सीमित है जहाँ तक सम्पत्ति को परिवर्तित कर डाला गया है।
(3) न्यास में कर्तव्य का निर्धारण स्वयं पक्षकारों द्वारा ही किया जाता है, जबकि अपकृत्यात्मक दायित्व की उत्पत्ति सामान्यतः कानून द्वारा निश्चित कर्त्तव्य के भंग से होती है।
(4) यदि दीवानी क्षति केवल न्यासभंग या मात्र किसी साम्यिक आधार के भंग से उत्पन्न हुई है तो इसे अपकृत्य के समूह में कदापि नहीं रक्खा जा सकता है। इस अपवर्जन का कारण मात्र ऐतिहासिक है। मूल रूप से अपकृत्य विधि साम्य से पृथक इंगलिश कामन लॉ का एक भाग है। कोर्ट ऑफ चान्सरी को इसकी कोई जानकारी नहीं थी। अतः न्यासभंग जैसे अपकार, जो मात्र चान्सरी कोर्ट के क्षेत्राधिकार में आते थे, अपकृत्य की कोटि से एकदम बाहर होते हैं (सामण्ड)।
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Law of Torts