Skip to main content

Phone Lost or Stolen? 3 Important Smartphone Tricks Everyone Should Know

 



A few months ago, something unexpected happened to me.

I was traveling from Gorakhpur to Lucknow Charbagh by bus. During the journey, I didn’t realize that my phone had slipped out somewhere in the bus. When I reached Charbagh and checked my pocket, I suddenly noticed that my phone was missing.
I tried to look for it, but the bus had already moved ahead. At the same time, I also had to travel to Sitapur for a Haldi shoot, so unfortunately I couldn’t spend much time searching for the phone and had to move on.
That day I understood something very important — when a phone gets lost, the biggest worry is not the price of the phone, but the data stored inside it.

Later, I learned about three important things every smartphone user should know:

1. If your phone gets stolen

You can go to www.ceir.gov.in⁠� and register your IMEI number to block the phone. Once blocked, no one will be able to misuse the device.

2. How to check if a phone is original or fake

Dial *#06# on your phone to see your IMEI number, then check it on imei.info. This will show the real model details and help you know whether the phone is genuine or not.

3. Emergency help without balance

If your phone has no balance, you can still dial 112 in an emergency. It is a national helpline number that can connect you to the police, ambulance, or fire brigade.

So here’s a small suggestion —

Right now, dial *#06# on your phone and write down your IMEI number somewhere safe. If you ever lose your phone, this small step could be very helpful.

Comments

Popular posts from this blog

क्या संविधान की प्रस्तावना बदली जा सकती है? Supreme Court में दायर हुई नई याचिका और कानून मंत्री का बयान

  संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्द 1. प्रस्तावना संविधान की प्रस्तावना भारतीय गणराज्य के उद्देश्यों और मूल्यों का परिचय है। यह भारतीय राष्ट्र की आत्मा की झलक प्रस्तुत करती है और यह स्पष्ट करती है कि भारत एक संप्रभु, लोकतांत्रिक, गणराज्य है जो न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व जैसे मूल आदर्शों के प्रति प्रतिबद्ध है। प्रस्तावना यह दिशा भी तय करती है कि राज्य किस प्रकार की नीतियों का अनुसरण करेगा और समाज किन आदर्शों की ओर अग्रसर होगा। लेकिन, खास बात ये है कि ये शब्द संविधान के मूल ढांचा है सुप्रीम कोर्ट ने अपने अपने फैसले में बताया है जिसका आगे उल्लेख किया गया है 2. 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्द कब जुड़े? संविधान की मूल प्रस्तावना में ये दोनों शब्द शामिल नहीं थे। इन्हें 42nd Constitutional Amendment Act, 1976 के माध्यम से आपातकाल के दौरान जोड़ा गया था। यह संशोधन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा लाया गया, जब राजनीतिक असंतोष, लोकतांत्रिक आवाजों का दमन और सत्ता की केंद्रीकरण जैसी परिस...

क्या हर गलती के लिए राज्य जिम्मेदार होता है? जानिए संविधान और कोर्ट का नजरिया

क्या राज्य हमेशा जिम्मेदार होता है? राज्य की प्रतिनिधिक दायित्व की संवैधानिक व न्यायिक पड़ताल जब कोई सरकारी कर्मचारी अपनी ड्यूटी के दौरान कोई गलती करता है या किसी व्यक्ति को नुकसान पहुँचाता है, तो एक अहम सवाल उठता है — क्या सरकार (राज्य) उस कर्मचारी के गलत कृत्य के लिए उत्तरदायी मानी जाएगी? यह सवाल सिर्फ कानून की किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे अधिकारों, न्याय और सरकार की जवाबदेही से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इस लेख में हम समझेंगे कि राज्य की प्रतिनिधिक दायित्व (Vicarious Liability of the State) का सिद्धांत क्या है, इसकी कानूनी व्याख्या कैसे की गई है, और न्यायालयों ने इस पर समय-समय पर क्या रुख अपनाया है। 📌 " प्रतिनिधिक दायित्व" का अर्थ Vicarious Liability का अर्थ है – जब कोई एक व्यक्ति दूसरे के किए गए कार्य के लिए उत्तरदायी ठहराया जाता है। उदाहरण के लिए, एक मालिक अपने कर्मचारी के द्वारा ड्यूटी के दौरान किए गए कार्य के लिए जिम्मेदार हो सकता है। जब यह सिद्धांत राज्य पर लागू होता है, तो यह प्रश्न उठता है कि क्या सरकार भी अपने अधिकारियों/कर्मचारियों द्वारा की गई गलती या...

X बनाम Y (2025): महिला सशक्तिकरण पर ऐतिहासिक फैसला"

  एक्स बनाम वाई (2025): आत्मनिर्भरता बनाम भरण-पोषण भारत की सर्वोच्च न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या भर नहीं करती, बल्कि समाज की धड़कनों को समझते हुए समयानुकूल दिशा भी देती है। ऐसे ही एक संवेदनशील और चर्चित मामले "एक्स बनाम वाई (2025)" में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा निर्णय दिया, जो न सिर्फ वैवाहिक कानूनों के नजरिए से अहम है, बल्कि महिला सशक्तिकरण और आर्थिक आत्मनिर्भरता के मूल्यों को भी मजबूती से सामने लाता है। यह मामला एक ऐसे दंपती के बीच था, जो कई वर्षों से एक-दूसरे से पृथक रह रहे थे। पत्नी ने भरण-पोषण की मांग की थी, जबकि पति की ओर से समझौते का प्रस्ताव दिया गया। मामला बढ़ते-बढ़ते भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा, जहाँ मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन, और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने इस पर विचार किया और एक न्यायिक दृष्टिकोण के साथ-साथ सामाजिक दृष्टिकोण को भी संतुलित किया। मामला क्या था? मूल विवाद एक तलाकशुदा या लगभग तलाक की स्थिति में पहुँचे दंपती के बीच था। पत्नी लंबे समय से अलग रह ...